मेहनतकश वर्ग के महान शिक्षक कार्ल मार्क्स के जन्मदिन पर क्रांतिकारी सलाम

दैनिक समाचार

कार्ल मार्क्स : जीवन और सिद्धांत

सर्वप्रथम यह जान लेना चाहिए की मानव इतिहास के युग–प्रवर्तक मेहनतकशों के महान योद्धा मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन ने अपने निजी जीवन के बारे में न कोई लेख लिखा और ना ही कोई आत्मकथा लिखी ।

हालांकि मेहनतकश वर्गों के वास्ते ताउमर लड़ते हुए उन्हें अथाह मुसीबतें और यातनाएं झेलनी पड़ी । जिसपर भी उन्होंने उस पर अपनी जुबान से चर्चा नहीं की । कारण मार्क्स, एंगेल्स , लेनिन जैसे महान क्रांतिकारी अपने जीवन को सामाजिक जीवन का एक अंग मानते थे । अपने द्वारा किए महान कार्यों को समस्त जनता द्वारा किए क्रांतिकारी कार्यों का एक हिस्सा मानते थे । इसलिए उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन की चर्चाएं नहीं की । जैसे कि पंडित नेहरू, गांधी जैसे तमाम तमाम पूजीवादी नेता विनम्रता के जामे में अपने व्यक्तिगत क्रियाकलापों की सेखियां बघाराने के वास्ते अपने व्यक्तिगत जीवन के वृतांत या आत्मकथाएं लिखते रहे हैं । इसलिए मार्क्स, एंगेल्स, लेलिन का जीवन-परिचय हमें उनके समकालीन या बाद के लेखकों द्वारा ही मिल पाता है ।

कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई 1818 को आज के जर्मनी के राइन प्रदेश के त्रियेर नगर में हुआ था । उन दिनों यह प्रदेश प्रसिया राज्य में था । हालांकि प्रसिया राज्य सामंती निरंकुशता व शोषण में फंसा हुआ था फिर भी फ्रांस की जनतांत्रिक क्रांतिओं के चलते राइन प्रदेश में प्रगतिशील व उदारवादी विचारों का प्रभाव फैला हुआ था ।

कार्ल मार्क्स के पिता, जो एक वकील थे, वे भी उदारवादी विचार रखते थे- परंतु क्रांतिकारी नहीं । पूरे परिवार का माहौल भी वैसा ही था, सुसभ्य, सुसंस्कृत और खुशहाल ।1830 में मार्क्स जिस पाठशाला में दाखिल हुए वहां भी राज्य विरोधी प्रगतिशील साहित्य लुके छिपे पढ़ा जाता था । मार्क्स ने अपना स्कूल छोड़ते समय जो एक लेख लिखा उससे उनके भविष्य की बखूबी झलक मिल सकती है । लेख का शीर्षक था, अपना पेशा चुऩने के बारे में एक नौजवान के विचार मार्क्स ने लिखा, “इतिहास उन आदमियों को महानतम कहता है, जो आम लोगों की भलाई कर के खुद महान बने हो । वही आदमी अधिकाधिक सुखी कहलाएगा, जिसने अधिकाधिक लोगों को सुखी बनाया हो” ।

समाज के दुखी व उत्पीड़ित लोगों के प्रति ऐसे दृढ़ संकल्प लेकर मार्क्स स्कूल छोड़ने के बाद 1835 में पहले बोन, फिर 1 साल बाद बार्लिंन विश्वविद्यालय में कानून पढ़ने हेतु दाखिल हुए । प्रसिया राज्य की राजधानी बार्लिन देश का राजनीतिक केंद्र तो था ही साथ ही कान्ट,फिशे, हेगेल और बाद में फायरबाख जैसे चीर- प्रसिद्ध दार्शनिकों के विचारों का गढ़वी था । ऐसे माहौल का मार्क्स पर भी असर पड़ा । हालांकि मार्क्स कानून के अपनी पढ़ाई में जमके लगे हुए थे । परंतु मार्क्स नें जब पाया कि जो सामाजिक प्रश्न उन्हें कचोटते रहते हैं उनके जवाब कानून विदेशी भाषाओं के उनके पाठ्यक्रम नहीं दे पाते हैं तो वे इतिहास व दर्शन का भी अध्ययन करने लगे उन दिनों हेगेल के दर्शन और हिंगलवादियों का बड़ा बोलबाला था ।

हेगेल की यह दार्शनिक उक्ति कि “हर वस्तु या घटना को उसके जन्म विकास और हास्य की दृष्टि से देखना चाहिए ” काफी प्रचलित थी । हेगेल के अनुयाई पुराने व युवा हेगेलवादियों में बटे हुए थे । मार्क्स युवा खेलों के सदस्य बन गए, जो वर्तमान समाज धर्म व प्रतिक्रियावादी दर्शन का कड़ा आलोचक था । परंतु बाद में जब मार्क्स ने गहरे अध्ययन के द्वारा हेगेल के दर्शन को भाववादी पाया तो वह उसे असंतुष्ट हो गए । क्योंकि मार्क्स उन दिनों भी दर्शनशास्त्र को मात्र चिंतन का एक विषय नहीं मानते थे, बल्कि उसे वस्तुगत जगत की जीवित सामाजिक समस्याओं के साथ जोड़कर सोचते विचारते थे ।

यह बात उनकी पीएचडी डिग्री के विषय प्राचीन भौतिकवादी यूनानी दार्शनिकों डिमाकिटस व एपिक्यूरस– से भी प्रचलित होती है । उसी लेख से हमें मार्क्स के तमाम विरोधी तूफानों के बीच चट्टानों की तरह खड़ा रहने के दृढ़ संकल्पित होने का भी पता लगता है ।

1841 में अपनी डिग्री प्राप्त करने के बाद मार्क्स ने विश्वविद्यालय में अध्यापकी करने का पहले विचार किया, परंतु बाद में प्रशियाई सरकार की दमनकारी नीतियों के कारण यह विचार छोड़ दिया । क्योंकि प्रशियाई सरकार ने कई युवा हेगेलवादियों को उनके प्रगतिशील पूंजीवादी विचारों के कारण अध्यापन कार्य से निकाल दिया था ।

1842 में मार्क्स ने कुछ प्रगतिशील पूंजीवादी विचारकों के साथ मिलकर राइनी अखबार नामक एक पत्रिका निकाली । इस पत्रिका में मार्क्स ने सामाजिक व राजनीतिक रूप से संपत्तिहीन लोगों की हिमायत में और सरकार की तानाशाही नीतियों के विरोध में जो लेख लिखे उनके कारण पत्रिका के प्रकाशन के एक साल बाद सरकार ने उन पर रोक लगा दी। प्रकाशको ने जब सरकार– विरोधी विचारों को कम कर के छापने की कोशिश की तो मार्क्स ने उनसे अपना नाता तोड़ लिया । कहते हैं इससे मार्क्स ने दो बातें सीखी, एक यह कि भौतिक स्वार्थ आदमी के जीवन में भारी भूमिका निभाते हैं और दूसरी यह कि पूंजीपति वर्ग सामंतवाद के विरुद्ध संघर्ष में ढुलमुल होता है । यह दूसरा सबक उन्होंने जीवन में पहली बार सीखा था । हर घटना हर वस्तु को गहराई व जिज्ञासा से विचारने वाले मार्क्स ने ऐसे अनुभव प्राप्त करके आर्थिक व सामाजिक समस्याओं का गहनतम अध्ययन शुरू किया। परंतु सरकारी सेंसर ने उन्हें अपने मातृभूमि छोड़कर फ्रांस जाने पर मजबूर कर दिया, जहां एक के बाद एक क्रांति की लपटें उठ रही थी ।

देश त्यागने से पहले मार्च में 1843 में जेनीवान वेस्टफालेन नामक एक युवती से शादी की, जो अभिजात सामंती घराने से संबंधित थी । उसका एक भाई बाद में जर्मन के राज दरबार में गृह मंत्री बना था । जेनी अपनी सुंदरता के वास्ते प्रसिद्ध होने के साथ-साथ कुशाग्र वह प्रतिभावान बुद्धि की भी मालिक थी । इसी कारण प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों के आराम दे घरानों में पलने के बावजूद जेनी ने मार्स जैसे जीवन साथी को चुना था । जिसकी मेघावी बुद्धि का तेज उन्हीं दिनों चमकने लगा था, परंतु जिसका भविष्य भी उतना ही खतरनाक अंधकारमय था । शादी के तुरंत बाद मार्क्स और जेनीे का नवविवाहित जोड़ा अक्टूबर 1843 में फ्रांस की राजधानी पेरिस पहुंचा । पेरिस में उनके सामने अन्य नवविवाहित जोड़ों की तरह मस्ती भरे जीवन की कल्पना नहीं थी, बल्कि प्रवासी जीवन की मुसीबतें मुंह बाए खड़ी थी । परंतु साथ ही थे, मार्क्स के हर माननीय शोषण उत्पीड़न के विरुद्ध एक दैत्य़ की तरह भिड़ने के दृढ़ इरादे । और यहीं से मार्क्स और उनके विचारों के विकास का जीवन शुरू होता है, जिन्हें सारी दुनिया आज मार्क्सवाद के नाम से जानती है और भविष्य में भी जानती रहेगी ।

मार्क्स के परिवारिक जीवन की अगर कोई एक विशिष्ट या प्रमुख बात नोट करने वाली है तो वह यही कि मार्क्स नें अपने पारिवारिक जीवन की असाधारण मुसीबतों के बावजूद न तो कही समझौता किया और नहीं अपने बिचारों व कार्यो से तिलभर भी हटे, और न ही कही किसी के आगे रत्ती भर झुकें । मार्क्स व जेनी ने क्या–क्या नहीं खेला ! कई बार पैसे-पैसे की मोहताजी, कर्जदारों के तकाजे, पैसे के अभाव में अपने लड़के का ठीक से इलाज न कर पाने के कारण उसकी मौत हो जाना, और फिर कफन तक के वास्ते दूसरे से कर्ज लेना आदि आदि । फिर इन सबके ऊपर जानलेवा परिश्रम । उनकी ऐसी मुसीबतों को देखकर ही किसी ने कहा था कि मार्क्स ने पूंजीवाद का विश्लेषण करने में और “पूंजी ” नामक पुस्तक लिखने में जितनी मेहनत की है, उतनी मेहनत अगर वह पूजी इकट्टी करने में करते तो करोड़ों रुपए कमा लेते । परंतु परिवारिक जीवन की विपदाएंं दुश्मनों की उनकी बेखुदी निन्दायें उन पर लगाए गए झूठे इल्जाम और यूरोप भर के शासकों द्वारा शिकारी कुत्ते की तरह उन्हें परेशान करने के प्रयास, यह सब कभी भी उन्हें नहीं डगमगा पाए, और ना ही उन्हें निराश व हतोत्साह कर पाए ।

वह बिना दम लिए निरंतर कार्य करते रहे, अपने दुश्मनों से निरंतर संघर्ष करते रहे । जैसा कि उन्होंने खुद भी कहा था कि “मैं दुनिया की दोनों पूजनीय शक्तियों के खिलाफ निरंतर संघर्ष करता रहूंगा– एक है परमात्मा, और दूसरा है बादशाह”। दोनों को जनता पूछती है दोनों से भय खाती है, दोनों की दास है परंतु मार्क्स एक विशालकाय दैत्य की तरह दोनों के खिलाफ भीषण संग्राम में कूदे, ताकि मानवता दोनों की दास्तां व शोषण से मुक्त हो सके ।

तमाम विरोधों और दुश्मनीयों तथा पारिवारिक विपदाओं के बावजूद वह अपने हर कार्य में जी जान से आगाध मेहनत किया करते थे । अध्ययन में, क्रांतिकारी संगठन बनाने में, आंदोलन व क्रांतियों की अगुवाई करने में, मजदूर आंदोलनों की छोटी से छोटी समस्या सुलझाने से लेकर दुनिया में हो रही तमाम बड़ी से बड़ी आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, और औद्योगिक, राजनीतिक व अन्य घटनाओं व समस्याओं पर सक्रिय रूप से विचार थे । चाहे वह घटना भारत में होने वाला सन् 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हो (जिस पर मार्क्स-एंगेल्स ने कई लेख लिखे हैं ) चाहे वह रुस व टर्की का युद्ध हो, चाहे वह आयरलैंड व पोलैंड की आजादी हेतु पूजीवादी भी संघर्ष हो, अथवा वह फ्रांस में होने वाली क्रांतियां, प्रतिक्रांतियां व गृह युद्ध हो ।

अध्ययन के क्षेत्र में अगर मार्क्स, एंगेल्स के अध्ययन की सूची देखी जाए तो वह भी हैरान की में डाल देती है । यह दोनों क्रांतिकारी यूरोप और अमेरिका की अधिकांश भाषाएं जानते थे कहते हैं, किसी भी भाषा में पत्र आता उसी में वे उसका जवाब देते थे ।

अंग्रेजी, फ्रांसीसी व जर्मनी भाषाओं के तो वे दोनों माहिर ही थे । क्योंकि वे इन तीनों भाषाओं के सैकड़ों साल पुराने रूपों को भी जानते थे । भाषाओं के अलावा खगोल शास्त्र, भूगर्भ शास्त्र, जीव विज्ञान, शरीर- क्रिया विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, इतिहास, समाज विज्ञान, आदि आदि का भी अध्ययन करते थे । शायद आप जानते हो मार्क्स के प्रिय विषय केवल अर्थशास्त्र व इतिहास ही नहीं थे अंग्रेजी, फ्रांसीसी व जर्मनी भाषाओं के तो वे दोनों माहिर ही थे क्योंकि वे इन तीनों भाषाओं के सैकड़ों साल पुराने रूपों को भी जानते थे । भाषाओं के अलावा खगोल शास्त्र, भूगर्भ शास्त्र, जीव विज्ञान, शरीर- क्रिया विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, इतिहास, समाज विज्ञान, आदि आदि का भी अध्ययन करते थे। शायद आप यें भी जानते हो कि मार्क्स के प्रिय विषय केवल अर्थशास्त्र व इतिहास ही नहीं थे, बल्कि गणित भी था, जिसमें उन्होंने कई शोध कार्य किए थे। उसी प्रकार एंगेल्स प्रकृतिक विज्ञानों के अलावा युद्ध कला के अध्ययन में अधिकाधिक रुचि लेते थे। पूंजीवादी तक उन्हें युद्ध विशेषज्ञ मानते थे ।

मजदूर आंदोलनों या फ्रांसीसी क्रांति जैसे क्रांतिकारी राजनीति में भाग लेने के बावजूद उन्होंने इतना अध्ययन क्यों किया ? क्योंकि वे मानव- समाज को, प्रकृति को और फिर प्रकृति और मनुष्य के अंन्तर्सबंधों को जानना चाहते थे । क्यों ? क्योंकि उन तमाम भ्रामक, कपटी, छली, मनगढ़ंत विचारों तथा रीति-रिवाजों का खंडन करना चाहते थे, जिनके अनुसार मानव प्रकृति का असहाय समझा जाता था । उदाहरण, यह समझ की प्रकृति एक ना जानी जा सकने वाली देवी शक्ति है। बारिश, पानी, आग, वायु सब देवी-देवता है ।

मनुष्य उनके आगे अनजान और असहाय है । वह उन पर जिंदगी और मौत के वास्ते पुर्णत: आश्रित है । प्रकृति या देवी शक्तियां क्रोधित होकर मानव समाज को बर्बाद कर सकते हैं । पुजारी वर्ग इन सारी दलीलों का सहारा लेकर समाज के अंजान दिन दुखी व गरीब मेहनतकशों को हर समय ठगता रहता था और ठगता रहता है । इतना ही नहीं सामंती वर्ग अपने आप को देवताओं का अवतार कहकर पूरे समाज का शोषण दोहन करता था । परिणाम स्वरूप समाज के निचले तबके समाज का सारा उत्पादन करने के बावजूद सदियों सदियों से गरीबी व बदहाली का जीवन जीते थे । साथ ही दोहरी दास्तां के अंतर्गत भी पिसते रहते थे । एक दास्तां थी सामंती वह पुजारी वर्ग की, और दूसरी थी प्रकृति से जुड़े काल्पनिक देवताओं की ।

मार्क्स, एंगेल्स ने इसी दोहरी दसता व शोषण उत्पीड़न से आम जनता को मुक्त करवाने हेतु एक तो मानव समाज की संरचना का, दूसरे प्रकृति का और तीसरे प्रकृति का और मानव समाज के अंतर संबंधों का गहरा अध्ययन किया । अपने पूर्ववर्ती दार्शनिकों व वैज्ञानिकों की खोजों के आधार पर मार्क्स ने बताया कि मनुष्य शुरू से अपनी जीविका के संसाधन (जैसे पेट भरने के साधन ) जुटाने के वास्ते प्रकृति से संघर्ष करता आया है । इसके वास्ते चाहे वह प्राचीन काल में जंगली जानवर मारता रहा हो, या जंगल काटकर खेतिया करता रहा हो, अथवा चाहे आज जमीन व पहाड़ों के पेट फाड़कर खनिज पदार्थ निकलता हो । क्योंकि प्रारंभिक काल में मनुष्य प्रकृति के बारे में अनजान था, अपने जीवन हेतु उस पर पुर्णत: निर्भर था, उसके सामने असहाय था, इसलिए उसने प्रकृति को सर्वशक्तिमान मान लिया और बाद में उसे मनुष्य रूपी देवता मान बैठा ।

प्रकृति के बारे में शुरू-शुरू में बिना छल कपट या स्वार्थ के बनाई गयी इसी अवधारणा को बाद में पुरोहित वर्ग अपने स्वार्थों हेतु इस्तेमाल करने लगा जो आज तक करता आ रहा है । हालांकि आज मनुष्य ने विज्ञान और टेक्नोलॉजी की सहायता से जीविका उत्पादन के नए- नए साधनों (जैसे खेती के हजारों तथा कल कारखानों में लगी मशीनों आदि) का विकास कर लिया है, परंतु उन पर धनवान वर्गों ने कब्जा कर रखा है । बिना काम किए हुए सारा उत्पादन हड़प जाते हैं । कमकरो को केवल पेट भरने लायक मजदूरी देते हैं‌ । इसी के फलस्वरूप समाज में एक तरफ निठल्लापन अमीरी अय्याशपस्ती हैं और दूसरी तरफ मेहनत, मशक्कत, गरीबी, अभाव और तंगदगस्ती है । इसी असमानता को, इस अत्याचार व उत्पीड़न को ग़रीब कमकर धनाड्य वर्ग से दया की भीख मांग कर खत्म नहीं कर सकते बल्कि संघर्ष द्वारा ही खत्म कर सकते हैं ।

कामगार वर्ग को खुद समाज के सारे उत्पादन का मालिक बन जाना चाहिए । जब वह खुद मालिक बनेगा तो वह विज्ञान व तकनीकी की सहायता से उत्पादन के साधनों का इतना विकास कर लेगा कि उससे समाज के तमाम प्राणियों की तमाम भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाएगी । तब तंगदस्ती, अभावग्रस्तता तथा गरीबी का अंत हो जाएगा । साथ ही आम आदमी को जहालत व अंधकारमयी परंपराओं और विचारों की बेड़ियों से भी मुक्ति मिल जाएगी ।

उपरोक्त सिद्धांतों का प्रतिपादन मार्क्स ने एंगेल्स के सहयोग से किया, दोनों ने मिल मिलाकर इतिहास में सबसे पहली बार दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, और हुकूमती वर्गों को अपनी क्रांतियों से कापने दो ‘ का गर्जन भरा नारा इस धरती पर पहली बार लगाया । क्या नारा मात्र ही दिया ? नहीं अपने नारे और अपने विचारों को व्यावहारिक राजनीति में लाने हेतु मार्क्स-एंगेल्स ने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणा पत्र निकाला । इस घोषणा पत्र में उन्होंने संक्षेप में पूंजीवाद, पूंजीवादी शोषण, सर्वहारा वर्ग, मध्यमवर्ग, पुजवादी पार्टियों, और नामधारी दिखावटी समाजवादी पार्टियों आदि का विश्लेषण किया । उनके प्रति सर्वहारा वर्ग की पार्टी का क्या दृष्टिकोण हो, यह भी उन्होंने बताया ।

इसके साथ ही उन्होंने सर्वहारा वर्ग की अपनी एक अलग स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी बनाने पर भी जोर दिया सर्वहारा क्रांति के वास्ते सर्वहारा पार्टी के कार्यक्रम का उन्होंने आम खाका भी खींचा ।
उस समय मार्क्स की उम्र मात्र 30 साल और एंगेल्स की 28 साल थी ।

“कम्युनिस्ट घोषणा पत्र” का प्रकाशन दुनिया में एक असाधारण और महान घटना थी । आज की तरह एक मामूली सी चीज नहीं थी क्योंकि आज के सुधारवादी कम्युनिस्ट पार्टियों की मौकापरस्तयों ने, पूजीवाद से उनके समझौता परस्तितियों ने तथा उनके चुनाववाद नें उनके अपने घोषणा पत्रों को एक मामूली राजनीति घोषणा पत्र बना दिया है । जिनकी न पूजीवाद चिंता करता है और न ही मजदूर वर्ग । क्योंकि दोनों जानते हैं कि यह तो कम्युनिस्ट पार्टियों का रोज मारने का काम ही है इंकलाब इंकलाब दहाड़ना और फिर पूजीपतियों की सत्ता व पद के आगे भीगी बिल्ली बनकर उसमें हिस्सेदारी करना । परंतु सामंती वह पूंजीवादी अत्याचार के उन दिनों में जब कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि कामगार वर्ग भी राज्य कर सकते हैं क्योंकि धन्नाढ तबके उन्हें नीच, गवार और मालिकों के दास और गधे समझते थे ऐसे जमाने में पुराने “घोषणा पत्र ” में जब मार्क्स, एंगेल्स नें कामगारों को क्रान्ति करने और क्रांति के द्वारा कामगार- राज्य कायम करने की घोषणाएं की तो धन्नाढ़ वर्ग उन्हें सुनकर एकदम सकते में आ गए ।

मार्क्स-एंगेल्स को उन्होंने सनकी वह गपोड़बाज कहना शुरु कर दिया । परंतु धन्नाढ़ वर्गों के बुद्धिजीवी, जिन्होंने ने मार्क्स, एंगेल्स के लेखों का गहराई से अध्ययन किया था, वह हैरान होने के वजाय आतंकित हो गये । उन्होंने भीे मार्क्स,को उकसावेबाज,षड्यंत्रकारी तानाशाह, असभ्य, देशद्रोही, समाज विरोधी, परिवार- विरोधी, आतंकवादी, चोर और ना जाने क्या-क्या कह डाला ! धर्मगुरुओं और पादरीयों ने मार्क्स के दिमाग को भूतों व शैतान का घर कहा ! यह स्वभाविक था क्योंकि मार्क्स राजाओं के, धर्म के ठेकेदारों तथा मुल्ला पादरी, पुरोहितों के तथा जमीदारों, पूजीपतियों, सेठों, साहूकारों-सुदखोरो, व्यापारियों, और जनतंत्र का जामा वोढ़े पूजीवादी पार्टियों एवं नामधारी समाजवादी पार्टियों के तथा पूंजीवानों की सेवा करने वाले अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों व दार्शनिकों के, जो भी कमकर वर्ग की मुक्ति में बाधक थे, उन सबको मार्क्स, एंगेल्स आलोचक व विरोधी थे ।

मार्क्स, एंगेल्स ने “कम्युनिस्ट घोषणापत्र ” के शुरू में लिखा कि यूरोप भर के शासकों पर अब कम्युनिज्म का भूत मंडरा रहा है । तब से आज तक सचमुच ही कम्युनिज्म का भय एक भूत की तरह दुनिया भर की शासक ताकतों पर मंडराता आ रहा है । क्योंकि तब से आज तक दुनिया भर के लुटेरे धन्नाढय वर्गो और उनकी लुटेरी सरकारों की मौत के घंटी लगातार बजती आ रही है, जो इस बात की सूचक है कि युगो-युगो से परजीवी वर्गों का चढ़ा हुआ सूरज अब डूबने वाला है और सदियों-सदियों से भूखे नंगे मजदूरों किसानों के लिए भोर की लालिमा आने वाला है ।

मार्क्स, एंगेल्स की समाज के बारे भविष्यवाणियां सपनों के समुद्र में डूबे किसी महात्मा या राजनेता की नहीं थी और ना ही पत्रा- पत्री पढ़ने वाले किसी ज्योतिषी की थी । ऐसा उन्होंने मानव समाज के इतिहास की खोजबीन करके और फिर पूंजीवादी समाज की जड़ से लेकर उसके फलने-फुलने तक और फिर उसके व पतन होने की अवस्था तक का विश्लेषण करके अपने सिद्धांत बन पाए थे । अपनी अथाह खोजों के आधार पर उन्होंने दुनिया में सबसे पहली बार बताया कि प्रकृति की तरह मानव-समाज के विकास व हारास के भी अपने नियम होते हैं ।

जिस तरह प्रकृतिक में सर्दी के बाद गर्मी और फिर बरसात जैसे परिवर्तन किसी दैवी शक्ति के कारण नहीं आते बल्कि प्रकृति के नियमों के कारण होते हैं। उसी प्रकार समाज में युद्धों के बाद शांति, फिर शांति के बाद युद्धों के जैसे परिवर्तन, या एक काल में समाज का विकास और फिर हरास आदि-आदि जैसे तमाम सामाजिक परिवर्तन सामाजिक नियमों के अनुसार ही होते हैं । मजदूरों किसानों की क्रांतियां भी उन्हीं सामाजिक परिवर्तनों की प्रमुख कड़ियां है ।

मार्क्स और एंगेल्स से पहले दुनिया में यह सोचा जाता था, कि जैसा कि आज भी आम तौर पर कहा जाता है कि राष्ट्रों के बीच युद्ध कुछ खास युद्ध पिपासु या हिटलर जैसे शैतान तानाशाह व्यक्तियों की देन है । सामाजिक क्रांतियां खुराफाती दिमागों के उपज है । अमीरी-गरीबी का फैसला पुराने जन्मों के कर्मों के आधार पर भगवान ने किया है । इसीलिए सामाजिक संकटों या युद्धों की भीषणता से मुक्ति पाने हेतु अथवा गरीबी के दुखों तकलीफों से मानवता को मुक्ति दिलाने हेतु किसी महापुरुष के अवतार लेने की आवश्यकता होती है ।

जो सुख समृद्धि और शांति का राज्य कायम करेगा और शोषण से जर्जर और मेहनत मशक्कत व दमन से चूते खून पसीने से लथपथ आदमी को सब्र से इंतजार की घड़ियां गिननी चाहिए । मार्क्स ने ऐसे तमाम विचारों को तार-तार कर के उधेड़ दिया । इन्हें उन्होंने शोषक वर्गों द्वारा फैलाए मनगढ़ंत व फरेबी प्रचार कहा, और समाज के बारे में किए आपने और पूर्ववर्ती दार्शनिकों के अध्ययन के आधार पर उन्होंने अमीरी गरीबी के बारे में जो बातें बताई उन बातों ने जहां गरीब कामगारों को जागृत व संगठनबद्भ करना शुरू किया और वही दूसरी ओर अमीर घरानों में तो भूकंप पैदा कर दिया ।

मार्क्स, के जिन बातों से अमीर घरानों में भूकंप पैदा कर दिया था वह बातें निम्नलिखित हैं ।

पहली बात ——–तथाकथित अथवा काल्पनिक भगवान द्वारा रचित मानव समाज आदर्शवादी महात्माओं तथा झूठे फरेब राजनेताओं की नजर में भले ही एक समान या बराबर हो, पर हकीकत में यह समाज वर्गों में बांटा रहता है।

एक है: धनाढ्य वर्ग, और दूसरा है: गरीब वर्ग है । दोनों में समानता नहीं होती है ।

दूसरी बात ——-यह अबराबरी किन्ही काल्पनिक पिछले जन्मों के आधार पर नहीं, बल्कि इसी जन्म के कर्मों के आधार पर ही अमीरी, गरीबी से पैदा हुई होती है । उसमें मामला केवल इतना ही होता है कि समाज के उत्पादन के साधनों के चंद लोग मालिक बने होते हैं और बाकी अधिकांशत: तो संपत्तिहीन कमकर होते हैं । अपनी जीविका हेतु कामगार वर्ग मालिक वर्गों के साधनों पर मेहनत करके उत्पादन करते हैं । उस उत्पादन में से मालिक वर्ग कामगार वर्गों को उनके श्रम के बदले उतनी ही मजदूरी देता है जिससे कि कामगार मजदूर और उसके परिवार के सदस्य अपने पेट भर सकें । बाकी का समूचा उत्पादन मालिक वर्ग खुद हड़प लेता है ।

मजदूर द्वारा किया यह फालतू या अतिरिक्त उत्पादन, जिसे मालिक हड़पता है, वही मालिक की पूंजी का स्रोत होता है। इसी से वह पूंजी इक्ट्ठठी करता है । अधिक पूंजी बनाने के लिए मालिक वर्ग मजदूर से और ज्यादा मेहनत करवाकर और अधिक उत्पादन करने पर जोर देता है । उत्पादन बढ़ाने के लिए मालिक वर्ग आए दिन उत्पादन के साधनों जैसे मशीनों उपकरणों व अन्य कल पुर्जों तथा उत्पादन के तरीकों का विकास करता रहता है ।

जितना ज्यादा उत्पादन बढ़ता जाता है , उतना ही अतिरिक्त उत्पादन (या उसका मूल्य) पूजीपतियों की जेब में बतौरे लाभ मुनाफा जाता रहता है । क्योंकि उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ या तो मालिक वर्ग मजदूरी नहीं बढ़ाता, और अगर वह बढ़ाता भी है तो उत्पादन वृद्धि के अनुपात में कतई नहीं बढ़ाता ।

पूंजीवादी समाजों में समस्त विज्ञान व तकनीक के विकास का यही एकमात्र मौलिक कारण होता है —-मजदूरों कीे मजदूर एक ही स्तर पर स्थित रखकर ,या उन्हें थोड़ा सा बड़ा के विकसित संसाधनों से अतिरिक्त- उत्पादन को बढ़ाते जाना और उन्हें बतौरे मुनाफा पूंजीपतियों द्वारा अपनी जेब में डाल लेना ।

अत: जैसे-जैसे कामगार बर्ग विकसित या बेहतर मशीनों पर काम करके उत्तरोत्तर उत्पादन बढ़ाता जाता है, वैसे वैसे जहां एक ओर मालिक वर्ग धनी धन्नाड़े होता जाता है, वही दूसरी ओर कामगार वर्ग की यथास्थिति बनी रहने के कारण वह मालिक की तुलना में गरीब होता जाता है । नतीजन, अमीरी –गरीबी की खाई चौड़ी होती जाती है । अतः अमीरों द्वारा कामगार वर्ग के शोषण से अमीरी- गरीबी पैदा होती है और साथ ही पैदा होती है अमीरी गरीबी के झगड़े।

अत: मार्क्स ने जो तीसरी बात बताई —–वह यह कि , क्योंकि मालिक धनवान वर्ग अधिक शोषण करना चाहता है , और मजदूर अपना शोषण कम करवाना चाहता है, मजदूरी अधिक चाहता है, तथा अंततोगत्वा व शोषण से मुक्ति चाहता है । इसलिए अमीर शोषको , और गरीब शोषितों में कोई सुलह समझौता या प्रेम परस्पर तालमेल नहीं हो सकता । समाज में तब तक अमीरी गरीबी के झगड़े रहेंगे, अमन शांति नहीं आ सकती, जब तक समाज में मालिक वर्ग और कामगार वर्ग रहेंगे ।

मार्क्स की चौथी बात ——-जो राजनेता अमीरों गरीबों में सुलह– समझौते की, अथवा भाईचारा बराबरी कायम करने की बातें करते हैं, वे एकदम झूठे और भ्रामक हैं । उनकी बातें कतई नहीं माननी चाहिए । क्योंकि जब समाज में एक निठल्ला वर्ग केवल शोषण करके स्वर्ग जैसे सुख का भोग करेगा , मेहनत करने वालों को नर्क में बताएं रखेगा , तो अमीरों और गरीबों में बराबरी और भाईचारे वाला परस्पर प्रेम कभी नहीं हो सकता।

अत: जो लोग समाज में सभी की भलाई करने, सबका कल्याण करने की बातें करते हैं ,वे महज छल कपट करते हैं । ऐसी बातें धनी वर्गों के राजनेताओं तथा समाजशास्त्रियों द्वारा या धर्म गुरुओं द्वारा जनता को फुसलाने बहकाने और उन्हें झूठा दिलासा देने के वास्ते की जाती है, ताकि जनता अपने शोषण के खिलाफ खड़ी ना हो जाए।

मार्क्स की पांचवी शिक्षा—– अमीरी- गरीबी में बंटे समाज में बराबरी, बराबर अधिकार, जनतंत्र और जनता के राज की बातें और कुछ नहीं धोखाधड़ी से भरे प्रचार मात्र हैं । ऐसे समाज में राज केवल धनी वर्गों का होता है । हां, लेबल उस पर जनता के राज का टैग लगा होता है ।

मार्क्स के छठी शिक्षा ——–जो समाज गरीबों के साथ होने वाले छल कपट से भरा हो, शोषण उत्पीड़न पर टिका हो, उस समाज के विभिन्न वर्गों में, शोषकों और शोषितों में शासकों व शासितों में अमन- चैन, सुलह समझौता नहीं हो सकता और ना ही श्रमिक वर्ग को इसके वास्ते प्रयास करना चाहिए, और ना ही ऐसे प्रयास करने वालों के धोखे में आना चाहिए । जबतक मालिक वर्ग और कमकर वर्ग रहेंगे, दोनों वर्गों में समझौते के बजाय आपसीे दुश्मनी के दुराव के अंतर्विरोध अनिवार्य रहेंगे । अतः मजदूरों को अपने शोषण के खिलाफ संघर्ष- यानी वर्ग संघर्ष करना चाहिए।

इतना ही नहीं, मार्क्स ने आगे जो कहा वह जाने लायक है । वह सारी दुनिया में प्रसिद्ध भी है, और उसी के कारण ही धनाड्य वर्ग मार्क्स से घृणा भी करता है। अतः उसे हमें हमेशा याद रखना चाहिए वैसे भी मार्क्स की चंद निहायत जरूरी हिदायतें में से यह भी एक जरूरी हिदायत है। उसने कहा, कामगार वर्गों को शोषण व गरीबी से मुक्ति के वास्ते वर्ग संघर्ष छोड़ना या धीमा नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे और ज्यादा तेज करना चाहिए । ताकी वर्ग संघर्ष अपने चरम सीमा यानी क्रांति की मंजिल तक पहुंच सके । क्रांति करके श्रमिक वर्गों को धन्नाढ़ वर्गों —पूजीपतियों, जमीदारों साम्राज्यवादियों —-को सत्ता से उखाड़ फेंकना चाहिए । उनकी सारी संपत्तियां –कल कारखानों, बैंकों, पूजियों व जमीनों आदि -पर कब्जा करके अपना खुद का मजदूर राज कायम करना चाहिए । यह राज मानसिक व शारीरिक श्रम करने वाली बहुसंख्यक जनता का राज होगा । ऐसा होने पर ही सही मायने में जनता का राज, यानी जनतंत्र आएगा ।

मजबूर राज्य में सब बराबर नहीं होंगे, जैसाकि पूंजीपति और उनकी पार्टियां आज आपने वर्तमान राज्य के बारे में झूठ बकती रहती हैं। क्योंकि आज राज तो पूंजीपतियों और जमीदारों तथा साम्राज्यवादियों का है, पर उस पर लेबल लगा है जनता के राज का । मार्क्स ने बिना झिझक, बिना लुकाय-छिपाए बेधड़क होकर घोषणा की कि– मजदूर –राज का मतलब होगा, कामगारो को आजादी और पूंजीपतियों जैसे शोषक वर्गों, उनके विद्वानों, राजनेताओं, अफसरों तथा पुरोहितों जैसे उनके नाना प्रकार के चापलूसी पर तानाशाही: ताकि उनकी शोषणकारी व छली कपटी जहरीली सभ्यता सांस्कृतिक का जड़ मूल से हमेशा के लिए सफाया कर दिया जाए ।तभी कहीं जाकर मेहनतकश वर्ग अपनी जरूरतों अनुसार उत्पादन करके गरीबी से, ऊंच-नीच से, अमीरों की घृणा से आजाद हो पाएगा । तभी वह सही मायने में आजादी बराबरी व भाईचारे वाला समाज कायम कर पाएगा ।

मार्क्स की सातवीं शिक्षा: —मजदूरों किसानों की मुक्ति किसी मुक्तिदाता के द्वारा नहीं होगी, बल्कि उनके अपने संघर्षों से हिंसक क्रांति से होगी। इसके बारे में उन्हें खुद सचेत होना पड़ेगा। इसके वास्ते उन्हें संगठित होना चाहिए और संगठित होकर लड़ना चाहिए, जिसका लक्ष्य हो क्रांति करना, क्रांति हेतु जनता को गोल बंद करना, और रोजमर्रा की अनेकों लड़ाइयां लड़ने हेतु अपने प्रोग्राम बनाना । ऐसी पार्टी अपने लक्ष्य को हासिल करने हेतु निरंतर और हर समय शासक लुटेरे वर्गों के विरुद्ध कभी खुले, कभी छिपे और कभी शांतिपूर्ण तथा कभी हिंसंक विरोधी व संघर्ष करती रहेगी ना कि आज की तरह पूंजीवादी पार्टियों के साथ संयुक्त मोर्चे की सरकार बनाकर जनता को बकाया करेगी ।

आप समझ सकते हैं कि मार्क्स-एंगेल्स के उपरोक्त सिद्धांत कोई किताबी या हवाई सिद्धांत नहीं है, बल्कि अमल लायक व्यावहारिक सिद्धांत है । उनके ऐसे सिद्धांतों की क्या-क्या स्रोत थे? एक था– 18 वी 19 वीं शताब्दी में यूरोप के विभिन्न देशों में होने वाली जनतांत्रि्क, व पूंजीवादी क्रांतियां तथा फ्रांस की मजदूर क्रांति (पेरिस कम्यून ) और यूरोप के मजदूर आंदोलन । इनके साथ में दोनों क्रांतिकारी विद्वान अभिन्न रूप से जुड़े हुए थे । इन क्रांति और आंदोलनों ने यह सिद्ध कर दिया था कि समाज को कूड़ा, कचरा और दब्बूू, डरपोक समझे जाने वाले मेहनतकश तबके अपने शोषकोंं के विरुद्ध लड़ते समय अभूतपूर्व वीरता और संगठनिक योग्यता दिखा सकते हैं और दूसरी तरफ, भाड़े के सैनिकों की संगीनों के बूते पर टिके शासक वर्ग वर्गीय लड़ाईयोंं में बुजदिल साबित होते हैं । यही बात उन्होंने मानव समाज के इतिहास में भी पाई थी । उनके सिद्धांतों व विचारों धाराओं का यह दूसरा स्रोत था ।

उनके अध्ययन का विषय था कि मानव- समाज किस प्रकार प्राचीन जंगली अवस्था से विकास कर के पहले दास युग में विकास किया, उसके बाद सामांती युग में और फिर अब सामंती समाज से मशीनी युग के पुजवादी समाज में विकास किया है । इसके बाद अब वह किस ओर विकास कर सकता है, यह भी उन्होंने खोजा ।

प्रश्न होगा यह अध्ययन उन्होंने कैसे किया ?

बिल्कुल एक वैज्ञानिक या डॉक्टर की तरह जो मनुष्य के शरीर को जानने समझने के वास्ते उसकी निर्ममता पूर्वक चिरफाड़ करता है। शरीर के छोटे से छोटे अंग से लेकर बड़े से बड़े हिस्से को जाचता है और फिर हर हिस्से के अन्य हिस्सों के साथ अंतरसंबंधों को देखता है । जैसे यह कि दिमाग का दिल के या पैर के साथ और फिर तीनों का एक दूसरे से आपस में क्या संबंध है ? अथवा यह की नसों के द्वारा किस प्रकार खून का दौरा शरीर में चलता है और कैसे संचालित होता है ?

मार्क्स-एंगेल्स ने इसी पद्धति पर समाज के हर हिस्से का और उनके बीच संबंधों का अध्ययन किया । उदाहरण: जमीदार व किसान, पूंजीपति व मजदूर, मजदूरों की मजदूरी व पूजीपतियों के मुनाफे , मुनाफे हेतु पूजीपतियों द्वारा मशीनों का विकास करना, या कम मजदूरी देना और फिर मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने हेतु लड़ाइयां, उसके वास्ते ट्रेड यूनियन बनाना, मजदूरों पूजीपतियों की पार्टियों का बनाना, जनता के नाम पर पूंजीवादी सरकारों का शासन करना, पूंजीवादी समाज में विज्ञान और टेक्नोलॉजी तथा नई नई मशीनें आदि का विकास होना, उससे अधिक उत्पादन होना, और फिर उसे खपाने के वास्ते बाजारों का विकास करना, उसी के लिए दूसरे देशों को गुलाम बनाना, मंदी महंगाई तथा मुद्रा व पूंजी के संकटों के जैसे पुजीवादी संकटों का आना, मजदूरों के संघर्ष और संघर्ष के जरिए पूंजीपति वर्ग को आर्थिक व राजनीतिक सत्ता से उखाड़ फेंकने हेतु मजदूर वर्ग द्वारा ऐतिहासिक भूमिका निभाना ।

वर्तमान समाज और उसकी भावी संभावनाओं को जानने समझने की इन्हीं पद्धति को द्वंद्वात्मक भौतिकवादी पद्धतियां करते हैं। अपनी विस्तृत खोजों के आधार पर मार्क्स-एंगेल्स ने ही दुनिया को पहली बार बताया की किसी समाज में सामाजिक बदलाव, या कहिए एक कॉल से दूसरे कॉल में समाज का विकास या ह्मस होना, —-उदाहरण, सामंती समाज से पूंजीवादी समाज में और पूंजीवादी से समाजवादी समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन का आना । किसी अवतारी पुरुष के अलौकिक ज्ञान अथवा भगवान रूपी किसी दैवी शक्ति की देन नहीं होते । उसके बजाय सामाजिक विकास व बदलाव मुलत: उत्पादन के तरीकों के विकास पर आधारित होते हैं । जैसे-जैसे उत्पादन के साधनों का विकास होता रहता है, वैसे वैसे समाज का विकास होता रहता है। उत्पादन के साधनों की विकास या बदलाव के साथ साथ समाज की ऊपरी ढांचे जैसे –अर्थतंत्र, राजनीतिक तंत्र, सभ्यता, संस्कृति, धर्म-कर्म, शिक्षा -दीक्षा, आदि भी बदलते रहते हैं। उदाहरण- हर हल बैल जैसे पुराने उत्पादन के साधनों और बारिश पर निर्भर पुरानी खेती की जगह अब ट्रैक्टर, ट्यूबेल, आदि वाली नई खेतिया आई हैं, उसी तरह कपड़े के छोटे-छोटे हथकरघा उद्योग की जगह बड़े-बड़े कपड़ा उद्योग खड़े हो गए हैं ।

इसी अवधि को कृषि विकास के अनुसार नई खेती से संबंधित कृषि कॉलेज तथा औद्योगिक विकास के कारण इंजीनियरिंग कॉलेज जहां तहां खुल गए हैं उसी प्रकार अर्थशास्त्र राजनीतिक शास्त्र व अन्य नए-नए समाजशास्त्र विषय आज की शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम बने हुए हैं । स्वभावत: प्रशासन- पद्धतियां और उनसे जुड़े नए नए नियम कानून आधुनिक औद्योगिक उत्पादन व विनिमय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं । पुराने युगों के सामंती राजपुरोहित राज और उनसे जुड़े ईश्वरी डरावने वाले न तो विधि विधान रह गए हैं और ना ही पुरोहित या ब्राह्मणवादी शिक्षा अब रह गई है । क्योंकि पुराने युगों की कृषि उत्पादन तथा उस पर आधारित सभ्यता की जगह अब नए युग के औद्योगिक उत्पादन और उस पर आधारित सभ्यता ने ले ली है ।
यह पूंजीवादी सभ्यता है, क्योंकि वह इंसान को पैसे से नापती तौलती है और खरीदती बेचती है। व्यक्तिगत लाभ की लालच स्वार्थ पैदा करती है । मनुष्यों के बीच मानवीय संबंधों की जगह पैसे के, स्वार्थ के संबंध पैदा करती है ।

आज बढ़ते हुए कृषि विकास विभाग औद्योगिकीकरण से और तथा रेल, डाक, तारों आदि के फैलते हुए जाल से, और उसी प्रकार नई शिक्षा के विस्तार से ——–प्रतीत तो ऐसा होता है जैसे समाज अब सुसभ्यता व सुख- समृद्धि की ओर बढ़ रहा है । अतः हर प्रकार के अभाव खत्म हो जाएंगे । लेकिन पूंजीवादी के अंतर्गत होने वाले सामाजिक विकास के भाग्य में यह नहीं बदा होता। और जो बदा होता है, वह आशा के बिल्कुल विपरीत होता है । विकास की जगह सामाजिक हरास, समृद्धि की जगह अभाव, रोजगार की जगह बेरोजगारी, खुशहाली की जगह बदहाली, समाज को गाहे- बगाहे दबोचने लगती है । आशा के विपरीत आने वाले इन संकटों के क्या कारण होते हैं ?

जैसा कि 1983 में पिछले लगभग 10 सालों से भारत जैसे दुनिया के तमाम पिछड़े देश और उन्हीं के साथ साथ अमेरिका व यूरोप के विकसित देश नाना प्रकार के संकटों में फंसे हुए थे । यह क्यों ? क्या उनका कारण किन्ही राजनेताओं या सत्ता धारी पार्टियों की मात्र गलत नीतियां हैं, जैसा कि अक्सर प्रचार किया जाता है ? अगर ऐसी बात होती तो अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली जैसे देश या भारत पाकिस्तान जैसे देश आर्थिक संकटों से हमेशा के लिए मुक्त हो गए होते । क्योंकि इन देशों में पिछले कई सालों से कितनी बार सरकार बदल चुकी है । तुरंत हुए क्या ? सत्ता पर आने वाली हर नई पार्टी के हर नेता संकटों के समाधान की नई नई नीतियां के गठ्टर पर गठ्टर अपने सिर पर लेकर सत्ता पर आते रहे हैं। परंतु संकठो के बादल और अधिक गहरे होकर तमाम देशों पर किसी अमंगल सूचक की तरह छाए रहते हैं। इससे हमें यह जरूर सीख लेना चाहिए कि- पूंजीवादी संकट ना तो किसी विशेष पार्टी की मात्र गलत नीतियों की देन होते हैं और ना ही किसी विशेष पार्टी की मात्र सही नीतियों से संकटों से छुटकारा मिल सकता है । अतः आर्थिक संकट हल करने के पूजीपतियों के धन पर पलने वाले राजनेताओं की वायदे मात्र जनसाधारण जनता को छलने और उसे झूठे दिलासे देने के वास्ते किए जाते हैं । उनके झूठे वादों का एक लक्ष्य तो होता है, आज जनता को झूठे दिलासे देकर गद्दी पर चढ़ने की लालची नेताओं की अपनी व्यक्तिगत भूख, और दूसरा लक्ष्य जो प्रमुख है वह है पूंजीवादी संकटों के असली कारणों को छिपाना, और यह दिखाना कि यह संकट पूजीवादी प्रणाली से पैदा नहीं हुए बल्कि इस या उस पार्टी या राजनेता की गलत नीतियों से पैदा हुए हैं ।

ऐसा करके राजनीतिक नेता पूंजीवाद और पूंजीवादी पार्टियों के आगे ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं । कारण अगर मान लें कि नेतागण आम लोगों को यह बता दें कि यह संकट पूंजीवादी पार्टियों की देन नहीं है बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था की देन है, तो आम जनता इन पार्टियों की सरकारें बदलने के बजाय पूंजीवादी व्यवस्था को ही बदलने उखाड़ने के पीछे पड़ जाएगी । इसी कारण यह पार्टियां हर चालबाजी से पूंजीवाद को टिकाए रखने का प्रयास करती रहती हैं । यही कारण है कि हम पूंजीवाद की चाकरी में लिप्त इन नेताओं व उनकी पार्टियों को पूजीवादी नेता व पार्टियां कहते हैं।

दिखावे के लिए तो खादी के कपड़े वाले, परंतु रहन-सहन के वास्ते शानदार आरामदेह घरों में रहने वाले शक्ल सूरत में चिकने, चुपड़े, गंभीरता, विनम्रता और विद्वता का ढ़ोग करने वाले पुजवाद के यह धूर्त नेताओं और विद्वानों के पास अगर वास्तव में कोई आत्मा नाम की चीज होती, जिनकी वे दिन रात दुहाई देते रहते हैं। परंतु जो जनता का खून चूसते –चूसते कपटी पिशाच बन चुकीे है, तो यह लोग पूंजीवाद की दलाली नहीं करते । पूंजीवाद और पूंजीवादी संकठो के बारे में आम जनता को गुमराह न करते, उससे संबंधित सच्चाई उसे आम जनता को अवगत करवाते हैं ।

मार्क्स-एंगेल्स ने बहुत पहले ही बता दिया था कि शुरू शुरू में विकास व दिखावटी समृद्धि की छलांगे मारने वाला पूजीवादी समाजवाद में अनिवार्य संकटग्रस्त होता है । उसका पतन अवश्यंभावी है । कुछ काल की वास्ते स्वस्थ दिखने वाला पूजीवादी समाज की दरवाजे अपनी मौत की ओर खुलेे रहते हैं । कारण? अपने तरह-तरह के संकट और अपने पतन के बीज पूजीवादी समाज स्वयं अपने विकास के साथ-साथ अपने भीतर पैदा करता रहता है ।

संशोधनवाद से सावधान रहने की जरूरत है । —

मार्क्स, ने बताया कि, जैसे-जैसे उत्पादन के साधनों -मशीनों, कल कारखानों, रेलों व खेतियों का विकास तथा फैलाव होता जाएगा, पूंजीपति वर्ग भी उतना ही धनवान होता जाएगा । क्योंकि वही उत्पादन के साधनों का मालिक होने के नाते औद्योगिक विकास का सारा लाभ अपनी जेब में डालता जाता है । अतः पूंजीवादी समाज में औद्योगिक विकास का मतलब ही है, पूंजीपतियों की पूजियों का विकास ।

एक ओर तो यह होता है, और दूसरी ओर उसके कारखानों खदानों इत्यादि में काम करने वाले संपत्तिहीन मजदूरों की संख्या भी बढ़ती रहती है, जो अपनी रोजी-रोटी के लिए मालिक वर्ग पर आश्रित होते हैं । उन्हीं के श्रम द्वारा उत्पन्न धन पूजीपतियों को अधिकाधिक ध़न्नाढ़ और मजदूरों को पूंजीवालों का मोहताज या अर्द्वदास बनाता जाता है ।

दो वर्ग आमने सामने खड़े हो जाते हैं । परिणाम स्वरूप असमानता पैदा होती है । उद्योगों के बढ़ने के साथ साथ-यह असमानता की खाई भी चौड़ी हो जाती है । न तो कोई इसे रोक सकता है और ना ही नियंत्रित कर सकता है । इसे कम करने के दावे मात्र बहकावा होते हैं । मालिक वर्ग मुनाफे के लालच में हमेशा कम मजदूरी देना चाहता है मजदूरों की छटनी करके उन्हें बेरोजगार बना देता है। मजदूर अधिक मजदूरी के वास्ते और छंटनी के खिलाफ लड़ता रहता है । फलत: ऊपर-ऊपर से समृद्धि और विकास की ओर कुलांचे भरने वाले समाज के भीतर पूंजीपतियों व मजदूरों के बीच दुराव, दुश्मनी व अंतर्विरोध लगातार बढ़ते रहते हैं। यह अंतर्विरोध शुरू-शुरू में कभी-कभी औद्योगिक क्षेत्र के मजदूरों की हड़तालों के रूप में फूटते हैं और भयानक तूफान की तरह समूचे समाज को अपनी चपेट में ले लेते हैं । मजदूरों के साथ-साथ शारीरिक व मानसिक श्रम करने वाली आम जनता भी इस तूफान को हवा देने लग जाती है।

इस अंतर्विरोध के अलावा पूजीवाद दो अन्य प्रमुख अंतर विरोध को जन्म देता है । एक है, पूंजीपतियों के आपसी अंतर्विरोध! दूसरा है, पूंजीवाद की विकसित अवस्था साम्राज्यवाद तथा उसके गुलाम देशों के बीच के अंतर्विरोध । इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों का पूंजीवाद विकास करते-करते अपने-अपने देशों की सीमाओं को लांघकर पिछली शताब्दी में ही एशियाई, अफ्रीकी, दक्षिणी अमेरिकी व अरब देशो को लूटने पाने के वास्ते निकल पड़ा था । दूसरे देशों को लूटने पाटने वाले विकसित पूंजीवाद को ही आर्थिक व राजनीतिक परिभाषा की दृष्टि से साम्राज्यवाद कहा जाता है । नीचोड़ में कहें —–साम्राज्यवाद विकसित पूंजीवाद है, जो दूसरे देशों को लूटता है ।

उसके लूटने के तीन प्रमुख तरीके हैं— पहला, दूसरे देश के कृषिगत व औद्योगिक कच्चे सामानों वह मालों को लूटना । दूसरा है, दूसरे देशों को अपने यहां के औद्योगिक माल बेचना । तीसरा तरीका है, दूसरे देशों में अपनी वित्तीय पूंजी लगाकर उसे कर्जे देकर उसपर सूद मुनाफे लूटना । पूंजीवाद का यह विश्वव्यापी लुटेरेपन का रुप मार्क्स के मरने के बाद विकसित हुआ था । इसी कारण इसकी व्याख्या और विश्लेषण मार्क्स के बाद मेहनतकशों के महान अध्यापक ब्लादिमीर इलिच लेनिन ने अपनी पुस्तक “साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की चरम अवस्था” में की है । परंतु इसका यह तात्पर्य नहीं कि मार्क्स के समय इसकी शुरुआत नहीं हुई थी । मार्क्स के समय ही यूरोपीय पूंजीवाद यूरोप से निकलकर एशियाई व लातिनी अमेरिकी अफ्रीकी देशों को लूटने निकल पड़ा था । इसी कारण जिन-जिन देशों में उसके विरुद्ध किसी भी तरह के संघर्ष या युद्ध हुए, मार्क्स-एंगेल्स ने उनका खुले दिल से समर्थन किया । जैसे भारत कें 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन किया । इस संदर्भ में हमारे यहां के पूंजी वादियों और तथाकथित सोशलिस्टों के मार्क्स पर लगाये गये इल्जामों पर दो शब्द कह दिये जाय ।

इनका इल्ज़ाम रहा है कि मार्क्स ने 1857 के भारतीय संग्राम का विरोध किया था । उनकी हमदर्दी इंग्लैंड के साथ थी । क्योंकि वह खुद यूरोपीय नस्ल वह खून का था न कि एशियावासी । यह सरासर झूठा, गंदा और बेशर्मी भरा इल्जाम है । ऐसे लोगों ने या तो मार्क्स-एंगेल्स के लेख नहीं पढ़े थे, या उन्हें झुठलाते थे । मामला केवल इतना है कि मार्क्स, एंगेल्स ने सुरु से ही इंग्लैंड के लुटेरेपन का विरोध किया करते थे ।

जब 1857 का संग्राम छिड़ गया तो उन्होंने उसका स्वागत किया । परंतु जैसे-जैसे वह संग्राम फैला तैसे – तैसे उन्हें महसूस हुआ कि हिंदुस्तानी यह संग्राम जीत नहीं पाएंगे । क्योंकि जहां इंग्लैंड विज्ञान और टेक्नोलॉजी में प्रशासन व युद्धकला में आधुनिक और श्रेष्ठ है, वंही हिंदुस्तान जैसे देश इन तीनों में पिछड़े हुए हैं । अत: उनकी पराजय होगी । मार्क्स-एंगेल्स की इसी निराशाजनक भविष्यवाणी से हमारे यहां के तथाकथित समाजवादी यह मतलब निकालने लग गए की मार्क्स-एंगेल्स भारत के स्वतंत्रता संग्राम के हिमायती नहीं थे । यह अर्थ निकालना नहीं है बल्कि जानबूझकर किसी की बात का कुअर्थ निकालना या उसे तोड़ना मरोड़ना है ।

कोई आप की लड़ाई को देख कर कह दे कि आप हार जाएंगे, या डॉक्टर आपके मर्ज को देख कर कह दे कि आप मर जाएंगे तो क्या इसका मतलब है कि वह चाहता भी यही है ? उसकी आपके साथ हमदर्दी नहीं है ? ऐसे कुतर्क या कुअर्थ देने वाले खुद कौन हैं ? यह देखना जरूरी है । मात्र किसी की आलोचना नहीं सुननी चाहिए। उसे जांचना परखना भी चाहिए कि वह कौन है ? तभी पता लगेगा कि वे मार्क्स-एंगेल्स के क्यों आलोचक है ।

आप पाएंगे कि ये पूंजीवादी और समाजवादी सामाजिक समता और सामाजिक न्याय की बातें तो दिन-रात हांकेगेे, लेकिन रहेंगे हमेशा पूजीपतियों के साथ । उन्हीं सें चंदे लेकर राजनीति करेंगे, चुनाव लड़ेंगे, पार्टियां बनाएंगे । मार्क्स और उनके सिद्धांत चूकी पूंजीवाद विरोधी हैं, इसलिए मार्क्स से अपनी दुश्मनी निकालने के वास्ते पूंजीवादी राजनीतिज्ञ मार्क्स पर झूठे इल्जाम लगाते रहते हैं ताकि मार्क्सवाद की तरफ भूल से भी ना सोचें ।

कुछ इसी प्रकार के इल्जाम लेनिन पर भी लगा करते थे, जैसे जर्मनी के वास्ते जासूसी करने और रूस से गद्दारी करने के इल्जाम । क्यो ? क्योंकि मार्क्स के बाद लेनिन ने ही पूंजीवाद के अंतरराष्ट्रीय लुटेरेपन के चरित्र को; और फिर उसके युद्ध, पिपासु चारित्रिक गुणों को बताया । और साथ ही पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध मजदूर क्रांतियों की रणनीतिया बनाई । पश्चिमी साम्राज्यवादियों के विरुद्ध उनके गुलाम भारत जैसे एशियाई अफ्रीकी व लातिन अमेरिकी देशों के मुक्ति-संग्रामों के रास्ते बताएं । उनके अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट संघ बनाएं ।

ऐसे में स्वाभाविक है, समस्त जगत के पूंजीपति परंतु खासकर पश्चमी यूरोप के पूंजीपती साम्राज्यवादी तथा दुनिया भर के पूंजीपतियों के दलाल, विद्वान एवं राजनीतिज्ञ, लेनिन से हमेशा नफरत दुश्मनी करते थे, उनसे भयभीत रहते थे । लेनिन ने जहां उत्पीड़ित राष्ट्रों व उत्पीड़ित वर्गों मजदूरों किसानों की क्रांतियों के रास्ते बताएं, वहीं उनके मौलिक कारण भी बताएं । मार्क्स एंगेल्स ने क्रांतियों के जो रास्ते बताए थे, उन्हें ही लेनिन ने अंतरराष्ट्रीय पैमाने की क्रांतियों की रणनीतियों के रूप में विकास किया था ।

मार्क्स ने — पूंजीवाद के भीतरी अंतर्विरोधों को इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी की उदाहरण देते हुए बताया था कि पूंजीवाद अपनी कब्र स्वयं अपने आप ही खोदता रहता है । इसलिए मजदूरों को उसका फायदा उठा कर उसके विरुद्ध क्रांति करने के लिए तैयार रहना चाहिए । उदाहरण : पूंजीपति वर्ग का और हर पूंजीपति का, एकमात्र लक्ष्य होता है, वह औद्योगिक मुनाफा लूटना । उसके लिए वह जहां मजदूरों किसानों का अधिकाधिक शोषण करता है वहीं पर वह आपस में एक दूसरे से भी टकराता रहता है ।
हर पूंजीपति इस कोशिश में रहता है कि वहीं पूरे समाज पर हावी हो जाए दूसरे पूंजीपति उसका मुकाबला ना कर पाए । इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु वह बैंकों व बाजारों पर तथा कच्चे सामानों के स्रोतो पर जैसे- खनिज भंडारों, खदानों व खेतियों पर तथा उसके मूल्यों व बिक्री के बाजारों पर अपना नियंत्रण बनाने का प्रयास करता है । ताकि बाजार में बिकने वाले किसी भी सामान का वही (या उसका संघ ) एकमात्र उत्पादक हो और वही उसका एकमात्र विक्रेता हो । इसका एक प्रमुख तरीका है, पहले अपने सामानों को दूसरे के सामानों से सस्ता बेचना, दूसरों के सामानों को बाजार से खदेड़ देना । फिर एक मात्र विक्रेता बनकर बाद में अपने सामानों के मनमाने दाम लेना ।

कभी तो जानबूझकर बढ़ाकर और कभी जानबूझकर उस समान की बाजार में कमी किल्लत पैदा करके । पूजीपतियों के इस लालच और लालचपूर्ति के इन तरीकों के परिणाम स्वरूप समाज में मंदी, महंगाई, कालाबाजारी, चोरबाजारी, मुद्रा व वित्तीय संकट पूरे समाज में पैदा होने लग जाते हैं । एक तो इस प्रकार के आम संकटों के चलते, दूसरे पूजीपतियों द्वारा सीधे मजदूरों किसानों के शोषण उत्पीड़न के चलते, पूंजीवादी समाज में त्राहि-त्राहि मची रहती है । सीधे सपाट लूटपाट का तरीका है। किसानों के कृषिगत उत्पादन सामानों के कम मूल्य देना और उन्हें अपने समान महंगे में बेचना ।

मजदूरों को अधिकाधिक लूटने का तरीका है एक तो सीधे मजदूरी कम देना, दूसरे अधिकाधिक लाभ मुनाफे हेतु उत्पादन की लागत मूल्य घटाने की खातिर आए दिन बैंकों, उद्योगों ,खदानों में मजदूरों व अन्य कर्मचारियों की छटनी करते रहना । आधुनिकरण के नाम पर नई नई मशीनें लगाकर मजदूरों की छटनी करते हुए जानबूझ के समाज में बेकारी पैदा करते रहना और इसका दोष जनसंख्या वृद्धि को देना । पूंजीपति वर्ग के लालच स्वार्थ के चलते जहां समाज में नाना प्रकार के सामाजिक आर्थिक राजनीतिक संकट गाहे-बगाहे छाते रहते हैं, वहीं पर एक तो इन संकटों के चलते और दूसरे पूंजीपतियों के सीधे शोषण उत्पीड़न के चलते मजदूरों, किसानों का जीवन हराम हुआ रहता है । उन्हें हड़ताल प्रदर्शन व अन्य प्रकार के संघर्षों पर उतारू होना पड़ता है ।

समाज में अशांति कुव्यवस्था पैदा होती है । इतना ही नहीं, मजदूरों-किसानों के संघर्षों से जहां अशांति पैदा होती है, वहीं पर विभिन्न पूजी पतियों की आपसी टकराहटें, एक दूसरे को गिराने व खदेड़ने के प्रयास भी समाज में आर्थिक राजनीतिक खीचातानियां पैदा करते रहते हैं । इस संबंध में तथ्यगत उदाहरणें दिखाकर मार्क्स ने निचोड़ मे बताया कि इन्ही सामाजिक आर्थिक संकटों के चलते पूंजीवादी समाजों में कभी भी अमन चैन शांति नहीं आ सकती । आएगी भी तो अस्थाई तौर पर कतई नहीं, आज की शांति कल अशांति में बदल जाएगी । अत: अशांति कुव्यवस्था शोषण उत्पीड़न से बचने का मजदूरों किसानों के पास एक ही रास्ता है । इसके जनक वर्ग पूंजीपति को सत्ता से हटा देना और अपना राज्य कायम करना ।

मार्क्स के बाद लेनिन ने दिखाया कि किस तरह पूजीपतियों के शोषण, उत्पीड़न और मुनाफे की भूख के चलते एक देश के भीतर शांति व्यवस्था नहीं रह सकते, गरीबी बेकारी नहीं जा सकती, उसी तरह पूजीपतियों साम्राज्यवादियों के चलते अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर भी अमन चैन शांति कतई नहीं रह सकती । क्यों ? क्योंकि जिस प्रकार एक देश के पूजीपति अपने देश की जनता को लूटते हैं, उसी प्रकार वे दूसरे देशों के जनसाधारण को लूटते पाटते हैं । इसके चलते अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर भी वही अंतर्विरोध वही झगड़े पैदा होंगे, जो किसी देश में पूंजीवाद के चलते पैदा होते हैं । उदाहरण- एक तो भारत, चीन, वियतनाम जैसे लूटपाट के शिकार गुलाम व अर्द्व गुलाम देश अपनी लूटपाट व दास्तां के विरुद्ध इंग्लैंड फ्रांस जैसे साम्राज्यवादी देशों से अपनी आजादी के वास्ते लड़ेंगे । फलत: अंतरराष्ट्रीय शांति भंग होगी व होनी भी चाहिए ।

मुक्तियुद्ध होना चाहिए । दूसरे अगर वे मान लें, ना भी लड़े तो भी विभिन्न देशों के साम्राज्यवादी पूंजीपति आपस में लड़ते रहेंगे । वहीं अंतरराष्ट्रीय शांति भंग कर देंगे । कारण – जिस प्रकार एक देश के पूंजीपति आपस में एक दूसरे से टकराते रहते हैं, एक दूसरे को गिराकर खुद हावी होने का प्रयास करते हैं, वैसे ही अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर एक देश के पूंजीपति दूसरे देशों की पूंजीपतियों को विश्व- बाजार से खदेड़ने का तथा उन पर हावी होने का प्रयास करते रहते हैं । उनमें इसके लिए टक्कर होती रहती है कि कौन अधिकाधिक देशों को अधिक से अधिक लूटता है ।

इंग्लैंड के पूंजीपति चाहेंगे कि दुनिया के अधिकाधिक देशों को अपना दास बनाएं, फ्रांस या जर्मनी के पूंजीपति चाहेंगे कि उन्हीं की लूटपाट का राज्य दुनिया के अधिकाधिक देशों पर हों । दुनिया के देशों को आपस में बांटने के वास्ते सभी देशों के साम्राज्यी पूंजीपति आपस में शांति समझौते करने के प्रयास भी करते हैं । परंतु जिस प्रकार आम ठगों, उच्चको, लुटेरों, डाकुओं में लूटपाट को लेकर कोई अस्थाई समझौता नहीं हो सकता, वैसे ही साम्राज्यी ठग लुटेरे भी बार-बार समझौता करने के बाद भी लूटपाट के बंटवारे पर आपस में लड़े बिना नहीं रह सकते । उनमे युद्ध होना अनिवार्य है । विश्व शांति स्थाई नहीं हो सकती । इसलिए जैसे मार्क्स ने बताया कि किसी भी पूंजीवादी समाज में अमन चैन शांति कायम हो नहीं सकती, वैसे ही लेनिन ने बताया कि विश्व पैमाने पर पूंजीवाद के रहते विश्व शांति कायम नहीं हो सकती । सामाजिक अशांति का ही विकसित व विस्तृत रूप अंतरराष्ट्रीय अशांति है । क्योंकि एक देश का पूंजीवादी ही विकास करके अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद यानी साम्राज्यवाद बना होता है । अपने देश के समाज को लूटने के कारण, वह अपने समाज में अशांति कुव्यवस्था पैदा करता है । फिर विकसित होकर दूसरे देशों को लुटने के कारण वही लूटेरा पूंजीवाद विश्व में अशांति अव्यवस्था, युद्ध पैदा करता है ।

सामाजिक अशांति और विश्व अशांति को फैलाने में मात्र अपनी जिम्मेदारियों को छिपाने के वास्ते मक्कार पूंजीवाद दिन रात शांति-शांति चिल्लाता रहता है । इसीलिए पहले मार्क्स ने फिर एंगेल्स ने और फिर लेनिन ने बार-बार मजदूरों, किसानों को समझाया कि उन्हें पूजीपतियों व उनके राजनीतिक दलालों के शांति, शांति की ढोंगी पाखंडी, छली कपटी, व झूठे नारो प्रवचनों में नहीं फंसना चाहिए । उनके नारों व भाषणों पर कभी यकीन नहीं करना चाहिए । ऐसा अगर वे करेंगे तो पूजीपतियों से उसी तरह धोखा खाएंगे जैसे कि यह सदियों से धन्नाढ़ वर्गो से धोखा खाते आए हैं । इसी के साथ-साथ मार्क्स-एंगेल्स ने और फिर लेनिन ने भी यह बताया कि धोखेबाज धन्नाढ़ वर्ग तब भी शांति-शांति चिलाएगा जब मजदूर किसान अपनी गरीबी बेकारी या महंगाई के विरुद्ध संघर्ष करना शुरू करेंगे, अथवा क्रांति हेतु गोलबंद होंगे । ऐसा होने पर पूजीपतियों के दलाल राजनीतिज्ञ और विद्वान मजदूरों किसानों को समझाने आएंगे कि उन्हें अपनी मांगे शांतिपूर्ण ढंग से तथा कानून व्यवस्था में रहकर करनी चाहिए ।

शांतिपूर्ण ढंग से सामाजिक परिवर्तन या समाजवाद लाना चाहिए । धन्नाढ़ो और उनके दलालों के इस प्रकार के छलावे भारमावे का इसी से पता लग सकता है कि आज तक इतिहास में किसी भी देश के धन्नाढ़ वर्ग ने शांतिपूर्ण ढंग से मात्र कहने या मांगने पर न तो अपना राजकाज छोड़ा है और ना ही अपनी कोई पूरी संपत्ति । जो धनी वर्ग ₹5 र रुपया ज्यादा मजदूरी मांगने पर लाठी गोली चला देता है, क्योंकि ₹5 देने पर उसे घाटा होगा, वही बस 50 करोड़ या 500 करोड़ रुपए की धन सम्पत्ति कैसे मात्र मांगने पर छोड़ देगा, जो ₹5 छोड़ने के वास्ते तैयार नहीं है ? इसलिए मजदूरों किसानों को धन्नाढ़ों के झूठ वादों, दिलासों या अन्य प्रकार के माक्कर फरेब से हमेशा बचना चाहिए ।

साथियों मार्क्स, कहते हैं कि मजदूरों, किसानों को धन्नाढ़ो के झूठ वायदों, दिलासों या अन्य प्रकार के मक्कार-फरेब से हमेशा बचना चाहिए । उस वर्ग पर, और उसके दलालों पर, कभी यकीन नहीं करना चाहिए ।

अपने वर्गीय संगठन- मजदूरों, किसानों के संगठन व पार्टियां बनानी चाहिए । अपने वर्गीय हितों व मांगो हेतु वर्ग —संघर्ष करना चाहिए और पूंजीपतियों के भीतरी अंतर्विरोधों का जैसे पूजीपतियों की आपसी तकराहटों व झगड़ों का, तथा पूंजीवाद संकटों तथा युद्ध से उत्पन्न मौकों का फायदा उठाकर क्रांतियां करनी चाहिए । रूस में लेनिन और फिर स्टालिन के मरने के बाद रूसी कम्युनिस्ट पार्टी ने 1956 में निहायत ही बेशर्मी और गद्दारी का परिचय दिया । उसने मार्क्स व लेनिन के उन्हीं मौलिक सिद्धांतों को बदल दिया, नए सिद्धांत गढ़ दिए , जिनका मार्क्स, एंगेल्स व लेनिन सख्त विरोध किया करते थे ।

ये नए सिद्धांत मजदूरों, किसानों के हितों के विरोधी और पूंजीपतियों और साम्राज्यवादीयों के हितों के हिमायती हैं । मार्क्सवादी सिद्धांतों को बदलने के वास्ते रूसी कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्तमान परिस्थितियों का बहाना बनाया । उसने कहा कि वर्तमान युग में विश्व शांति के खातिर मजदूरों किसानों को हिंसक क्रांति नहीं करनी चाहिए । सामाजिक परिवर्तन करने के वास्ते यानी समाजवाद लाने के वास्ते शांतिपूर्ण तरीका अपनाना चाहिए । वह है संसदीय तरीका । चुनाव में बहुमत हासिल करके मजदूरों, किसानों की पार्टियों को अपनी सरकार बनाकर धीरे-धीरे शांतिपूर्ण तरीके से समाजवाद की और बढ़ना चाहिए ।

मार्क्स और फिर लेनिन के समय में भी इस तरह के सिद्धांत पेश किए जाते थे । मार्क्स व लेनिन ने ऐसे सिद्धांतों और उन्हें पेश करने वालों को कम्युनिस्ट संगठनों से उठाकर बाहर फेंक दिया था । लेनिन ने ऐसे लोगों के बारे में बताते हुए बार-बार कहा कि यह लोग प्रायः मध्यमवर्गीय होते हैं, परंतु राजनीतिक जीवन में पूंजीपतियों के हिमायती बन जाते हैं । पूंजीवादी सभ्यता इन्हें प्रभावित करती रहती हैं । इन्हें आप अक्सर पूंजवादी नेताओं के साथ चाय खानों, होटलों, क्लबों, सांसद भवनों में गपोड़बाजी की राजनीति करते हुए देख सकते हैं । बोल भाषा में यह लोग मार्क्सवादी होते हैं, परंतु वस्तुतः पूजीपतियों के हिमायती होते हैं ।

मजदूरों, किसानों की कतारों में यानी पार्टियों संगठनों में बैठे ये लोग बड़े घाती होते हैं । कारण, यह लोग शांति के नाम पर एक तो मजदूरों किसानों को वर्ग संघर्ष व क्रांतिया नहीं करने देते, शांतिपूर्ण परिवर्तन के बहाने मजदूरों किसानों को संसदीय चुनाव में उलझाए रहते हैं, जिनका फायदा वे खुद उठाते हैं । फिर मजदूर किसान अगर क्रांतिकारी संघर्ष करते भी हैं तो यही लोग पूंजीवादी पार्टियों के साथ मिलकर शांति व कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर मजदूरों किसानों के संघर्ष व क्रांतियों को कुचलने के जघन्य कार्य करते हैं ।

लेलिन में ऐसे लोगों को सुधारवादी संशोधन वादी कहा क्योंकि ऐसे लोग खुद को एक ओर मार्क्सवादी करते हैं, और दूसरी ओर मार्क्स के मौलिक क्रांतिकारी सिद्धांतों को संशोधित व परिवर्तित करते हैं । उन्हें सुधारते रहते हैं । कहने को यह लोग मार्क्सवादी हैं, पर व्यवहार में पूंजीवादी हैं, जैसे रंगे शियार । उसी तरह लेनिन उन विकसित देशों की “समाजवादियों ” को सामाजिक साम्राज्यवादी कहा, जो लोग खुद को कहते तो थे समाजवादी पर अपने या दूसरे देशों के साम्राज्यवाद का विरोध नहीं करते थे । साम्राज्यवादी सरकारों के साथ मेलजोल के संबंध रखते थे ।

मार्क्स-एंगेल्स और फिर लेनिन मजदूरों किसानों के ऐसे छली व कपटी हिमायतीयोंं से सारी उम्र लड़ते रहे । आज दुर्भाग्य है कि उसी देश में मार्क्स-एंगेल्स के क्रांतिकारी सिद्धांतों को सबसे ज्यादा बदलने का काम उसी पार्टी ने शुरू किया है, जहां पूंजीपतियों के विरुद्ध सबसे पहले क्रांति हुई, और जिस पार्टी की अगुवाई किसी वक्त लेलिन कर रहे थे । पर इससे मजदूरों किसानों को घबराना नहीं चाहिए । जैसे कि अक्सर मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी हवा का रुख बदलने पर घबरा के दुम दबाकर भाग खड़े होते हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मार्क्सवाद व लेनिनवाद ना तो पूजीवादियों या सुधारवादियों का सिद्धांत है, कि उसके बदलते ही अपना रुख बदल लिया जाए । यह मजदूरों किसानों का सिद्धांत है । शोषण, उत्पीड़न, गरीबी, जहालत से उनकी मुक्ति का सिद्धांत है । दूसरे, यह रूस का या रूस में पनपा सिद्धांत भी नहीं है । यह पूरी दुनिया के मजदूरों किसानों का सिद्धांत है । इसी कारण मार्क्स-एंगेल्स ने अपनी समय में किसी एक देश के मजदूरों की एकता का नारा नहीं लगाया, बल्कि “दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ” का नारा लगाया था ।

इसलिए मार्क्सवाद, लेनिनवाद को अगर कोई तोड़ता मरोड़ता है, तो वह हमारे, यानी पूरी दुनिया के मजदूरों किसानों के सिद्धांत को तोड़ता मरोड़ता है, अतः: यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी गरीबी बेकारी जहालत से छुटकारा पाने हेतु पूजीवाद के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए अपने सिद्धांतों की सुरक्षा करें । इस प्रकार आज के युग में हमारे एक साथ करने वाले दो कार्य हैं।
पहला सुधारवादियों से संघर्ष करना, मार्क्सवाद- लेनिनवाद को बचाने के वास्ते
दूसरा पूंजीवाद से संघर्ष करना, मजदूरों , किसानों का राज्य कायम करने के वास्ते।

दुनिया के मजदूरों ——एक हो जाओ।

—–साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष करो।

—–सुधारवाद को अपनी प्रांतों से निकाल फेंको।

—–मार्क्सवाद का झंडा बुलंद करो । वही तुम्हारी मुक्ति का रास्ता है ।

—–साम्राज्यवाद उस पर हमलावर है । सुधारवाद उसकी जड़ें खोद रहा है , उसकी रक्षा करो । उसके लिए जूझ जाओ ।

——मार्क्सवाद- लेनिनवाद में 1955 से हो रहे क्रांति –विरोधी सुधार बदलाव, सुधारवाद- संशोधनवाद का, नाश हो ! नाश हो।

विनोद कुमार
टंकक व संकलनकर्ता- प्रमोद चौरसिया

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