एच. आर . ईसराण
पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा राजस्थान
डिक्टेटर खुद नहीं आता, लाया और बुलाया जाता है. गाजे-बाजे से सिंहासन पर बैठाया जाता है. पूजारों की फौज खड़ी करता है जो उसे ‘देवों का देव’ घोषित करती है. फिर वह अपना पूरा ध्यान अपनी छवि के निर्माण पर केंद्रित करता है. जनता का सिर और जनता की ही मोगरी. जन-धन पर डाका डलवाता है और उसके बलबूते पर मीडिया की ताकतों को अपने पक्ष में कर, अपनी छद्म छवि गढ़वाने में लगा रहता है.
ढोंग को अपनी ढाल बनाता है. देश को तबाही की आग के हवाले कर उसे नवनिर्माण कहता है.
बीते जमाने के डिक्टेटर-हिटलर-के उदय और पतन की कहानी पढ़िए जो मैंने दो साल पहले फेसबुक पर पोस्ट की थी. पुनः गौर से पढ़ लीजिए. शायद इतिहास से कुछ सीख मिल जाए.
एडोल्फ़ हिटलर : मानव अथवा दानव?
Adolf Hitler: Man or Monster?
पढ़िए और इतिहास के इशारों को समझ लीजिए.
आज ही के दिन अर्थात 30 अप्रैल को, विश्व में बीसवीं सदी के सर्वाधिक चर्चित (और संभवतः सर्वाधिक घृणित) तानाशाहों में शुमार एडोल्फ हिटलर (जन्म: 20 अप्रैल 1889; आत्महत्या: 30 अप्रैल 1945) ने आत्महत्या का कृत्य कारित कर, दुनिया के सामने ख़ुद को ख़ाक का पुतला ख़ुद ने ही साबित किया था. वैसे नफ़रत की प्रतिमूर्ति बनकर उभरे शख्स का अंततोगत्वा यही हश्र होता है.
विडम्बना देखिए कि हिटलर ने ख़ुद को एवं उसके पूजकों व प्रचार तंत्र ने उसको ‘दिव्य पुरूष’ के रूप में प्रचारित कर उसे दिव्यता और परामानव होने का आवरण ओढ़ाकर ख़ूब महिमामण्डित कर रखा था.
हिटलर का राष्ट्रीय व वैश्विक परिदृश्य पर उत्थान और पतन बेहद रोमांचक ढंग से हुआ.
प्रारंभिक जीवन
हिटलर पढ़ाई-लिखाई में फिसड्डी साबित हुआ. 1905 में 15 साल की उम्र में सेकेंडरी स्कूल परीक्षा में फैल होने के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी. कलाकार (चित्रकार) बनने की ललक हावी हुई. लेकिन विएना आर्ट्स एकेडमी ने भर्ती करने से मना कर बाहर का रास्ता दिखा दिया. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हिटलर जर्मन सेना में भर्ती हुआ और युद्ध में 1918 में जर्मनी की पराजय के बाद 1919 में सेना से पृथक होकर म्यूनिख में एक ख़ुफ़िया व राजनीतिक प्रचारक (Political propagandist) के रूप में काम करना शुरू किया.
पृष्ठभूमि
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1919 में हुई वर्सेल की संधि के प्रति जर्मनी में क्रोध उपज रहा था क्योंकि उसमें न सिर्फ जर्मनी को दोषी ठहराया गया, बल्कि उस पर युद्ध जुर्माना भी थोपा गया. जर्मनी के कुछ प्रान्त हड़प लिये गये. ऐसे वातावरण में जर्मनी में एक अतिराष्ट्रवादी भावना पैदा हुई.
प्रथम विश्व युद्ध में हार के बाद जर्मन आर्मी ने हार का ठीकरा यहूदियों, रिपब्लिकन नेताओं व कम्युनिस्टों पर फोड़ दिया.
राष्ट्रवाद के नारे को अतिवाद में बदल दिया गया और उसी का हिस्सा था यहूदी विरोध, साम्यवाद विरोध, गणतंत्र विरोध.
उस दौर में जर्मन सेना के भीतर इस तरह के तत्व थे, जो देश में गणतंत्र को रोकने की कोशिश कर रहे थे. राजतन्त्र के हिमायती ये रूढ़िवादी तत्व कहते थे कि ‘प्रथम विश्व युद्ध में रिपब्लिकन नेताओं, कम्युनिस्टों व यहूदियों ने हमारी पीठ में छुरा भौंका है. हमें हरवाया गया है, हम हारे नहीं. देशद्रोही तत्वों ने हमें हराया है.’
हिटलर का उदय
हिटलर के भाषणों से प्रभावित होकर सेना ने उसको रेजिमेंट का शिक्षक नियुक्त कर दिया. सेना में जोश भरने का काम उसे सौंपा गया. सेना उस वक्त सेमिनार आयोजित कर लोगों को समझा रही थी कि गणतंत्र सिर्फ़ एक ढकोसला है.
एक तरफ़ सेना में ये सब हो रहा था तो दूसरी तरफ अतिराष्ट्रवाद और समाजवाद को मिलाकर एक मिश्रित विचारधारा गढ़ कर 1920 में एंटोन ड्रैक्सलर ने “जर्मन वर्कर्स पार्टी” की स्थापना की. बाद में हिटलर भी इस पार्टी में शामिल हो गया.
हिटलर के भाषण देने की कुशलता निखर कर सामने आने लगी. म्यूनिक के बीयर हॉल में उसने भाषण देने का सिलसिला शुरू किया. यहां वह जमकर अंधराष्ट्रवाद, कम्युनिस्ट विरोधी, यहूदी विरोधी, लोकतन्त्र विरोधी भाषण दिया करता था. इससे धीरे -धीरे उसका नाम प्रचारित होने लगा. जर्मन वर्कर्स पार्टी का ही बाद में नाम बदलकर जर्मन नेशनल सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी कर दिया गया, जिससे नाज़ी शब्द निकलता है.1921 में हिटलर इस पार्टी का चेयरमैन/ लीडर बन गया और अपने समर्थकों को इस पार्टी में शामिल कर पार्टी पर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया.
उस समय जर्मनी में गणतन्त्र की जड़ें नहीं थीं. समाज खुद अस्तव्यस्त था. भारी संख्या में लोग युद्ध में मारे गये थे. बेरोजगारी चरम पर थी. आर्थिक संकट के साथ राजनीतिक संकट था. इस वातावरण में धीरे धीरे, एक नये प्रकार की राजनीति बनने लगी और इस राजनीति में मौजूदा परिस्थितियों के प्रति क्रोध प्रकट हो रहा था.
उस माहौल में बहुत सारे सैनिकों की नौकरी ख़त्म हो गई थी और वे सड़कों पर घूम- फिर रहे थे. टोलियों में उनकी लामबन्दी की गई. प्राइवेट आर्मी की तरह काम कर रही ‘फ्री कोर’ नाम की एक पैरा मिलिट्री फोर्स भूतपूर्व सैनिकों की फोर्स थी. यह एक तरह का गुंडा फ़ोर्स था और इस फ़ोर्स का असल काम था राजनीतिक विरोधियों को ठोकना!
यह सब उस दौर में हो रहा था जब देश में गणतन्त्र बेहद डांवाडोल स्थिति में था.
हिटलर अपने भाषणों को प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी के साथ हुए अन्याय पर केंद्रित रखते हुए अंधराष्ट्रवाद की पैरवी करता और कम्युनिस्टों, रिपब्लिकन नेताओं व यहूदियों के खिलाफ विष वमन करता. हिटलर के पास अपनी बातें मनवाने का सबसे बड़ा एक तर्क यह था कि “वर्साय संधि’ पूर्णतया अन्याय पूर्ण है और दूसरा यह कि वर्साय की संधि पर सेना ने नहीं बल्कि सिविलयन गवर्नमेंट ने हस्ताक्षर किए हैं, जबकि शहीद तो सैनिक हो रहे थे!
हिटलर अपने ओजस्वी भाषणों में भूमिसुधार करने, वर्साई संधि को समाप्त करने और एक विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य जनता के सामने रखता जिससे जर्मन लोग सुख से रह सकें. यों कह लीजिए कि अच्छे दिनों के ख़ूब सुहाने सपने दिखाता.
स्पष्ट है कि हिटलर एक वातावरण की उपज था. इस वातावरण में हिटलर कुछ शासक वर्गों के लिये उपयोगी दिखने लगा. उन्होंने सोचा कि यह बंदा बहुत अच्छा भाषण देता है और लोगों की लामबन्दी करने में बहुत उपयोगी हो सकता है.
इस प्रकार 1922 ई. में हिटलर जर्मनी में एक प्रभावशाली और लोकप्रिय शख्स के रूप में उभरने लगा. समाचारपत्रों ने हिटलर के सिद्धांतों का जमकर प्रचार जनता में किया.
उसने भूरे रंग की पोशाक पहने सैनिकों की टुकड़ी तैयार की गई. हिटलर ने 1923 में जर्मन सरकार का तख्तापलट करने की कोशिश की जो नाकाम रही. उसे 1 साल 10 महीने की जेल हुई. जेल में उसने मीन कैम्फ Mein Kampf (“मेरा संघर्ष”) शीर्षक से अपनी आत्मकथा लिखी. इसमें उसने नाजी पार्टी के सिद्धांतों का विवेचन किया और यहूदी क़ौम को संस्कृति के संहारक (‘Destroyer of culture’), राष्ट्र के भीतर परजीवी व एक ख़तरा (‘a parasite within the nation, and a menace’) क़रार दिया!
उस दौर में जर्मनी में कुछ ऐसे शक्तियां थीं, जिनमें औद्योगिक, राजनीतिक और सैनिक शक्तियां शामिल थीं, उन्हें लगा कि हिटलर का इस्तेमाल एक उपयोगी औजार (useful tool) के रूप में किया जा सकता है. विरोधियों को ठिकाने लगाने, कम्युनिस्टों को कुचलने व गणतन्त्र को स्थाई होने से रोकने के लिये, उन्होंने हिटलर का इस्तेमाल करना शुरू किया. उन्हें मालूम नहीं था कि आने वाले वक़्त में पता चलेगा कि असल में कौन किसका इस्तेमाल करेगा.
जर्मनी की अर्थव्यवस्था जब पटरी पर थी तो हिटलर को केवल कुछ कट्टरपंथी ही पसंद करते थे. 1928 के आम चुनाव में उसकी नाज़ी पार्टी को केवल 2.6 फीसदी वोट मिले थे.
लेकिन अगले पांच सालों में हिटलर की लोकप्रियता बढ़ती चली गई और वह देश का सबसे लोकप्रिय नेता बन गया!
1929 में जर्मनी जब आर्थिक मंदी (जो पूँजीवाद की स्वाभाविक गति है) की चपेट में फंसा और देश में बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ी.
तब हिटलर के सुहाने वादों की ओर जनता आकर्षित हो गई.
नाज़ी पार्टी की एक समर्थक जुटा रयूडिजर के अनुसार, ”लोग भूखे थे. बहुत बुरे दिन चल रहे थे. हिटलर के बयानों से लोगों को लगता था कि वो सारी समस्याओं से मुक्ति दिला देंगें.
रयूडिजर को भी लगने लगा था कि यह (हिटलर) एक ऐसा आदमी है जो अपने लिए कुछ नहीं सोचता है, सिर्फ़ जर्मन लोगों की भलाई के बारे में सोचता है.”
वक़्त के साथ नाज़ी विचारधारा का प्रभाव समाज के ऊपर ही नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे और लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर भी होने लगा. जब किसी नाज़ी पार्टी के सदस्य को गुंडागर्दी के केस में पकड़ कर लाया जाता, तो वह आसानी से छूट जाता. और अगर कम्युनिस्टों को किसी गुंडागर्दी के केस में फंसाया जाता, तो उन पर दंड लग जाता. यानी धीरे- धीरे न्यायिक प्रणाली के ऊपर विचारधारात्मक प्रभाव पड़ने लगा.
उस वक्त के फ्रांस के महान लेखक नोयमन ने अपनी किताब ‘बेहीमथ’ में लिखा है कि प्रतिक्रांति के केंद्र में न्यायिक प्रणाली थी क्योंकि जानबूझ कर न्यायिक प्रणाली का एक झुकाव था और इस झुकाव में नाज़ी बचते रहे और उनके आलोचक फंसते रहे.
धीरे-धीरे इन शक्तियों को हर जगह संरक्षण और बल मिला और समाज में प्रोत्साहन मिलने लगा.
तानाशाही का दौर (1933- 1945)
विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की मार झेल रहे जर्मनी में हिटलर ने जनता के असंतोष का फायदा उठाकर अपने रसीले वादों व लच्छेदार भाषणों के बल पर, व्यापक लोकप्रियता हासिल की. उसे लोगों को अपने पक्ष में करने का तरीका आता था. आखिरकार जर्मनी के तत्कालीन राष्ट्रपति पॉल वॉन हिन्डेनबर्ग को जनवरी 1933 में हिटलर को जर्मनी का चांसलर (प्रधानमंत्री का समकक्ष पद) नियुक्त करना ही पड़ा, क्योंकि जर्मनों को ये बात समझाने में हिटलर कामयाब हो गया था कि जर्मनी का खोया हुआ सम्मान सिर्फ़ वही वापस दिला सकता है.
चांसलर बनते ही हिटलर ने जर्मन संसद को भंग कर दिया. साम्यवादी दल को गैरकानूनी घोषित कर दिया और राष्ट्र को स्वावलंबी बनने के लिए ललकारा.
हिटलर ने जोज़ेफ गोयबल्स को अपना प्रचारमंत्री नियुक्त किया. नाज़ी दल के विरोधियों को जेलखानों में डाल दिया गया. यहूदियों की प्रताड़ना का सिलसिला शुरू हो गया.
हिटलर की जो सीक्रेट पुलिस थी उसका नाम था गेस्टापो (पूरा नाम ‘गेहाइमे स्टाट्स पुलिट्साए’). असल में यह पॉलिटिकल पुलिस फोर्स थी. सीक्रेट पुलिस गेस्टापो की स्थापना 1933 में हुई और इसका फोकस राजनीतिक विरोधियों व राजनीतिक रूप से ख़तरा साबित हो सकने वाले लोगों को ठिकाने लगाना था.
इस सीक्रेट पुलिस ने कम्युनिस्टों और यहूदियों के साथ उन तमाम लोगों को पकड़ा जो हिटलर की अतिवादी सोच से असहमति रखते थे.
सत्ता की नाव पर सवार होकर हिटलर ने मार्च 1933 में एक एक्ट पारित करवाया जिसका नाम था ‘Enabling Act’. इस एक्ट के जरिये उसने सारी शक्तियां अपने अधीन कर ली.14 जुलाई 1933 को हिटलर ने गैर नाज़ी पार्टियों, संगठनों, यूनियनों पर प्रतिबंध लगा कर ख़ुद के नेतृत्व वाली नाजी पार्टी को ही जर्मनी की एकमात्र वैधानिक राजनीतिक पार्टी घोषित कर दी.
30 जून से 2 जुलाई 1934 तक तीन दिन हिटलर ने अपनी नाज़ी पार्टी के शुद्धिकरण के नाम पर Night of the Long Knives नामक कुख्यात अभियान को अंज़ाम दिया, जिसमें 400 नाज़ियों व अपने नज़दीकी संभावित विरोधियों को मौत के घाट उतरवा दिया!
कार्यकारिणी और कानून बनाने की सारी शक्तियाँ हिटलर ने अपने हाथों में ले ली. 2 अगस्त 1934 को राष्ट्रपति हिन्डेनबर्ग की मृत्यु होते ही, राष्ट्रपति पद को समाप्त कर उसकी समस्त शक्तियां चांसलर की शक्तियों में समाहित कर दी गईं. राज्य/ देश के मुखिया के रूप में हिटलर आर्म्ड फोर्सेज का भी सुप्रीम कमांडर बन गया. पूरा का पूरा संविधान उलट-पलट कर रख दिया गया और अब हिटलर जर्मनी का चांसलर से तानाशाह बन गया. राज्य का ढांचा ढहा दिया गया.
हिटलर का मकसद भी यही था. देश और पार्टी के बीच के अन्तर को समाप्त कर दिया गया.
जनता को पाठ पढ़ा दिया गया कि पार्टी और देश एक ही हैं. इसलिए सब लोग जर्मनी का मतलब नाज़ी पार्टी समझें. इसी की अगली कड़ी में पार्टी को व्यक्ति तक संकुचित करते हुए भक्तिभाव से यह कहा जाने लगा कि Germany is Hitler and Hitler is Germany.
हिटलर…. हिटलर…. हिटलर….
हर देश में कुछ पद स्थाई होते हैं जैसे भारत में सुप्रीम कोर्ट, नौकरशाही, चुनाव आयोग, UPSC, सेना, CVC- ये संस्थायें स्थाई हैं. ये संस्थायें सरकारों के आने- जाने से नहीं बदलती. संविधान के प्रावधानों के तहत बनी ये संस्थाएं राज्य/ देश को स्थायित्व प्रदान करती हैं.
देश औऱ दल में अंतर होता है. लेकिन हिटलरशाही में देश और दल को एक कर दिया गया. जितनी भी स्वाधीन संस्थायें थीं, उन सभी का अस्तित्व खत्म कर दिया गया. नाज़ी पार्टी ही एकमात्र वैधानिक पार्टी बन गई और इस तरह जो हालात बने उनके लिये अंग्रेज़ी में एक शब्द है Totalitarianism यानी सर्वसत्तावाद!
जर्मनी में हिटलर ने अपने मन माफ़िक एक सर्वसत्तावादी ढांचा कायम कर लिया.
प्रचार प्रेमी
हिटलर हद दर्ज़े का प्रचार व फ़ोटो प्रेमी था. आज से एक सदी पहले ही वह मीडिया और जनसंपर्क (Public Relation) के महत्व को समझ चुका था और शायद इसी वजह से वह अपनी पब्लिक स्पीच देने से पहले उसकी रिहर्सल करता था. इस बात का भी खास ख्याल रखता था कि उसकी वही फोटो अखबार में छपे जिसमें वो आकर्षक लग रहा हो.
हिटलर ने दुनिया में सबसे बड़ा भ्रामक प्रचार तंत्र स्थापित कर लाखों रेडियो सेट जर्मनी में बंटवाये ताकि लोग उसके मन की बातें सुन सकें. हिटलर का प्रचारमंत्री गोयबल्स दुनिया का पहला ‘गोदी मीडिया’ का झंडाबरदार था. वह कहता था कि किसी झूठ को सौ बार बोलने पर वह झूठ भी सुनने वालों को सच लगने लगता है.
नारसिस्ट/ आत्मकामी हिटलर ने अपनी 50 वें जन्म दिवस को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की. हालात यहाँ तक पहुँचे कि हिटलर चर्च पर भी हावी होने की हिमाक़त करने लगा. एक राष्ट्रीय चर्च स्थापित किया गया जिसमें बाइबिल के सामने मीनकांफ (हिटलर की आत्मकथा) को रखा गया, जिसमें क्रॉस के आगे एक बहुत बड़ा तलवार रखा जाता.
इस तरह से हिटलर जनता के दैनिक जीवन और आत्मिक जीवन में घुसने की कोशिश करने लगा.
हिटलर कभी-कभी जनता के सामने ख़ुद को ऐसे पेश करता मानो कि वह कोई मसीहा है. भाषण देते वक्त वह ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता जैसे कि कोई मसीहा बोल रहा है. बाइबिल से कुछ दृष्टांत निकाल कर पेश करता और लोगों को याद दिलाता कि मैं वही मसीहा हूँ जिसका आप इंतज़ार कर रहे थे.
नवयुवकों में राष्ट्रपति के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करने की भावना भर दी गई और जर्मन जाति का भाग्य सुधारने के लिए सारी शक्ति हिटलर ने अपने हाथ में ले ली.
अक्टूबर 1933 में राष्ट्रसंघ से जर्मनी का नाता तोड़ कर भावी युद्ध को ध्यान में रखकर जर्मनी की सैन्य शक्ति बढ़ाना प्रारंभ कर दिया था. प्राय: सारी जर्मन जाति को सैनिक प्रशिक्षण दिया गया.
यहूदियों की प्रताड़ना और उनका नरसंहार
हिटलर ने प्रजातंत्र से अपनी नफ़रत और राजनीतिक फायदे के लिए हिंसा के इस्तेमाल में यक़ीन को कभी नहीं छिपाया. वह कम्युनिस्टों और यहूदियों को जर्मनी का दुश्मन क़रार देते हुए उन पर अपनी ज़ुबान से जहरीले शब्द-बाणों से प्रहार करता रहता था.
दुष्प्रचार किया गया कि यहूदी कम्युनिस्ट हैं और षड्यंन्त्र करके देश के टुकड़े करके सत्ता हड़पना चाहते हैं.
दूसरी ओर यह भी कहा जाने लगा कि सभी बड़े- बड़े सूदखोर पूंजीपति यहूदी ही हैं.
माहौल ऐसा रचा गया कि साम्यवाद और पूंजीवाद, इन दोनों का ही दोषी, यहूदियों को ठहराया जाने लगा. वस्तुतः जर्मनी में यहूदियों ने पीढ़ियों से खुद को भाषा और संस्कृति के लिहाज़ से जर्मनी के साथ आत्मसात करने की कोशिश की और वे इसमें सफल भी रहे. लेकिन हिटलरशाही के दौर में हर एक चीज़ का दोषी यहूदियों को ठहराया जाता, जबकि जर्मनी में उनकी जनसंख्या एक प्रतिशत से कम थी.
हिटलर अपने दिल में घृणा की परवरिश करते हुए जर्मनी की सत्ता पर काबिज़ हुआ था. उसने यहूदियों को सब-ह्यूमन (कमतर प्राणी) करार दिया और उन्हें इंसानी नस्ल का हिस्सा मानने तक से इंकार किया.
1 अप्रैल 1933 को यहूदियों के विभिन्न व्यवसायों पर राष्ट्रीय बहिष्कार की नीति लागू कर दी गई.
7 अप्रैल को ‘Law for the Restoration of the Civil Services ‘ नामक क़ानून बनाकर यहूदियों को स्टेट सर्विसेज से पृथक कर दिया गया.
स्कूल -कॉलेजों में यहूदी छात्रों की संख्या सीमित कर दी गई.
नाज़ी सत्ता ने नस्ल की सफाई करने के नाम पर ‘Law to Protect the Racial Hygiene’ नामक कानून बनाकर आर्य और यहूदियों की शादी पर पाबन्दी लगा दी.
जो पहले से शादीशुदा थे उन्हें भी बहुत दिक्कतें झेलनी पड़ी. ‘Law for the Protection of German Blood and German Honour’- नामक क़ानून बनाकर, जर्मन यहूदियों और गैर यहूदियों की शादी प्रतिबंधित कर दी गई.
1934 में यहूदी अभिनेताओं पर फिल्म व थिएटर में अभिनय करने की मनाही थोप दी गई.
नाजी दल का आतंक जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छा गया.
1933 से 1938 तक लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई. सरकारी सरपरस्ती में 9 व 10 नवंबर 1938 को जर्मनी में हुई यहूदी विरोधी हिंसा में लगभग एक सौ यहूदी मारे गए. तीस हज़ार यहूदियों को गिरफ्तार कर उन्हें कंसंट्रेशन कैंप्स में यातना देने हेतु भेज दिया गया.
यहूदियों के प्रति हिटलर की इस नफरत का नतीजा नरसंहार के रूप में सामने आया, यानी समूचे यहूदियों को जड़ से खत्म करने की सोची-समझी और योजनाबद्ध कोशिश. होलोकास्ट इतिहास का वो नरसंहार था, जिसमें द्वितीय विश्वयुद्ध (1939- 1945) के दौरान 6 साल में जर्मनी में तकरीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई थी, इनमें 15 लाख तो सिर्फ बच्चे थे!
युद्ध में अपार जन-हानि-
विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य लेकर हिटलर ने 1 सितंबर1939 को पौलैंड पर आक्रमण कर दिया जिसके फलस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध भड़क उठा. प्रारंभिक सफलताओं के बाद हिटलर के पांव उखड़ने लगे. सोवियत रूस की सेनाओं द्वारा बर्लिन पर अधिकार करते ही जर्मन सेना ने बिना शर्त समर्पण कर दिया और इस तरह 7 मई 1945 को यूरोप में दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हो गया.
द्वितीय विश्वयुद्ध में लगभग 6 करोड़ लोग मारे गए. युद्ध की इस भयावह आग में जान गंवाने वाले इन लोगों में से खुद जर्मनी के सैनिकों व नागरिकों की संख्या लगभग एक करोड़ दस लाख थी. बेशुमार संख्या में सैनिक और आमजन घायल हुए. अधिकांश मध्य व पूर्वी यूरोपीय देश आर्थिक रूप से पूरी तरह बर्बाद हो गए. इतिहास की नज़रों में इस भारी तबाही का अहम दोषी हिटलर था.
“I want war. To me all means will be right. My motto is not “Don’t, whatever you do, annoy the enemy.” My motto is “Destroy him by all and any means.” I am the one who will wage the war!”
(“Hitler and Nazism”. by Louis Leo Snyder, p. 66, 1961)
मौत का डर-
हिटलर हमेशा मौत के डर के साये में रहता था. उसे यह डर सताता था कि कहीं उसके खाने में उसे जहर ना दे दिया जाए. इसलिए उसने भोजन चखने वाले (Food taster) नियुक्त कर रखे थे. ये फूड टेस्टर हिटलर का खाना चखने के लिये मजबूर थे और उन्हें अपने हर निवाले में मौत नजर आती थी. क्योंकि अंदेशा था कि हिटलर को जहर देकर मारने का प्रयास किया जा सकता है.
कुछ वर्ष पूर्व सामने आई टॉप सीक्रेट्स मिलट्री फाइल के अनुसार दुनिया को तबाही के कगार पर धकेलने वाला यह जर्मन तानाशाह दरअसल मानसिक रोगी था.
युद्ध के आखिरी चरण में हिटलर के सनकी फैसलों की वजह मादक पदार्थों पर उसकी अत्यधिक निर्भरता थी. जर्मन लेखक नार्मन ओहलर की पुस्तक ‘ब्लिट्ज्ड: ड्रग्स इन नाजी जर्मनी’ में दलील दी गई है कि हेरोईन जैसा नशीला पदार्थ जिसे युकोडेल कहा जाता है, उसे लेने की लत पड़ने से हिटलर सनकी व्यवहार करने लग गया था.
अंतिम पड़ाव-
द्वितीय विश्वयुद्ध में जब जर्मनी चौतरफे हमले से घिर गया तो डरा-सहमा हिटलर बर्लिन हेडक्वाटर में बने तहख़ाने में छुपकर जान बचाने की जुगत करने लगा. इसमें उसके साथ उसके कई सहयोगी भी शामिल थे. जमीन से 50 फीट नीचे बनाए गए बंकर में वह छुपकर रहता था और वहीं से ही निर्देश देता था. अपनी चहेती कुत्तिया ब्लाण्डी को कसरत करवाने के लिए कभी-कभार बंकर से बाहर चान्सलरी के बगीचे में जाता. वहां चारों तरफ बमों से ध्वस्त इमारतों के मलबे को देखकर वह कुंठा के कोहरे में घिरता जाता. जर्मनी पर लगातार बमों की बौछार हो रही थी. बर्लिन खंडहर में तब्दील होता जा रहा था. रूस की रेड आर्मी और अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस की सेनाएं जर्मनी की गर्दन तक पहुंचने वाली थी.
दूसरी तरफ बर्लिन में एक बंकर में दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह ख़ौफ़ के साये से घिरा अवसाद की गिरफ्त में आता जा रहा था.
हिटलर को यह मालूम था कि अगर मित्र देशों की सेना बर्लिन पहुंची तो उसे गिरफ्तार कर लिया जायेगा.
25 अप्रैल, 1945 के बाद से हिटलर के जीवन का सिर्फ़ एक ही मक़सद था – स्वयं अपनी मौत की तैयारी करना. 25 अप्रैल को ही उसने अपने निजी अंगरक्षक हींज़ लिंगे को बुला कर कहा था, “जैसे ही मैं अपने आप को गोली मारूँ तो तुम मेरे मृत शरीर को चांसलरी के बगीचे में ले जा कर उसमें आग लगा देना. मेरी मौत के बाद कोई मुझे देखे नहीं और न ही कोई पहचान पाए. इसके बाद तुम मेरे कमरे में वापस जाना और मेरी वर्दी, कागज़ और हर चीज़ जिसे मैंने इस्तेमाल किया है, इकट्ठा करना और बाहर आकर उसमें आग लगा देना.”
बीबीसी संवाददाता संजय मिश्र अपने एक आलेख में लिखते हैं कि हिटलर सुबह पाँच या छह बजे सोने जाता था और दोपहर के आसपास सो कर उठता था.
हिटलर की निजी सचिव त्राउदी जुंगा जो अंतिम क्षणों तक उस बंकर में हिटलर के साथ थीं, उसने बीबीसी से एक बार बात करते हुए कहा था, “आख़िरी दस दिन वास्तव में हमारे लिए एक बुरे सपने की तरह थे. हम बंकर में छिपे बैठे थे और रूसी हमारे नज़दीक चले आ रहे थे. हम उनकी गोलीबारी, बमों और गोलों की आवाज़ साफ़ सुन सकते थे.”
“हिटलर बंकर में बैठ कर इंतज़ार कर रहे थे कि कोई आ कर उन्हें बचाएगा. लेकिन एक बात उन्होंने शुरू से ही साफ़ कर दी थी कि अगर लड़ाई में उनकी जीत नहीं होती है तो वो बर्लिन कभी नही छोड़ेंगे और अपने ही हाथों से अपनी जान ले लेंगे. इसलिए हमें पहले से ही पता था कि क्या होने वाला है.”
लोमहर्षक अंत-
‘हिटलर्स लास्ट डे : मिनट बाई मिनट’ किताब में यह उल्लेख है कि 29 अप्रैल 1945 रात 12:10 बजे बंकर के क्रांफ्रेंस रूम में हिटलर ने अपनी एक महिला सचिव को ‘राजनीतिक वसीयतनामा’ लिखवाया, जिसमें उसने अपनी मौत के बाद Karl Donitz को राष्ट्रपति एवं प्रचारमंत्री गोएबल्स को जर्मनी का चांसलर बनाए जाने का औचित्य सिद्ध किया.
हिटलर ने कुछ दिनों से तय कर रखा था कि वह अपनी प्रेमिका इवा ब्राउन से शादी कर उस रिश्ते को वैधता प्रदान करेगा. 29 अप्रैल 1945 की शाम को बड़ी मुश्किल से एक पादरी को हिटलर के बंकर में लाया गया और हिटलर ने ईवा के साथ शादी रचाई. शादी प्रमाण पत्र पर हिटलर ने गोएबेल्स को और ब्राउन ने बोरमन को अपना गवाह बनाया. रॉबर्ट पेन अपनी किताब ‘द लाइफ़ एंड डेथ ऑफ़ अडोल्फ़ हिटलर’ में लिखते हैं, “शादी के सर्टिफ़िकेट पर …तारीख लिखी थी 29 अप्रैल जो कि ग़लत थी, क्योंकि शादी होते होते रात के बारह बज कर 25 मिनट हो चुके थे. कायदे से उस पर 30 अप्रैल लिखा जाना चाहिए था.”
शादी के बाद भोज का आयोजन किया गया और जाम छलकाए गए. पुराने दिनों की बातें करते हुए हिटलर का अचानक मूड बदल गया और वह बोला, “सब ख़त्म हो गया. मुझे हर एक ने धोखा दिया है.”
भोज के बाद जीवन के आखिरी दिन हिटलर ने कुछ घंटों की नींद ली और तरोताज़ा होकर उठा. नहाने और शेव करने के बाद हिटलर अपने जनरलों से मिला.
उनसे उसे पता चला कि सोवियत सैनिक किसी भी क्षण उनके बंकर में घुस सकते हैं. हमेशा जीतने की बात करने वाले तानाशाह के लिए यह हार नाकाबिले बर्दाश्त थी.
रॉबर्ट पेन लिखते हैं, “हिटलर ने प्रोफ़ेसर हासे को बुला कर पूछा कि साइनाइड के कैप्सूलों पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं ? हिटलर ने ही सलाह दी कि उनका परीक्षण उनकी प्रिय कुतिया ब्लांडी पर किया जाए. परीक्षण के बाद हासे ने हिटलर को रिपोर्ट दी, ‘परीक्षण सफल रहा’. ब्लांडी को मरने में कुछ सेकेंड से ज़्यादा नहीं लगे…मरने के बाद ब्लांडी और उसके छह पिल्लों को गोली मारी गई और एक बक्से में रख कर चांसलरी के बगीचे में ही दफ़ना दिया गया.
30 अप्रैल को अपराह्न ढाई बजे हिटलर अपना आखिरी भोजन करने के लिए बैठा. आदेश देकर पेट्रोल से भरे जेरी केनों को बंकर के बाहरी दरवाज़े के पास रखवाया गया.
भोजन के बाद हिटलर आख़िरी बार अपने साथियों से मिलने आया. उसने बिना उनके चेहरे देखे उनसे हाथ मिलाए. इनकी पत्नी इवा ब्राउन भी उनके साथ थीं.
फिर वो दोनों कमरे के अंदर चले गए.
जर्मनी का सबसे बड़ा तानाशाह कायरों की तरह खुद को तहख़ाने में छुपा कर बैठा था.
जब हिटलर को अपने बचाव का कोई रास्ता नज़र नहीं आया तो अपनी संभावित हार से हताश होकर उसने ज़हरीला पदार्थ खाकर सिर में गोली मारकर अपनी जान दे दी, जबकि उसकी नव नवेली दुल्हन ने जहर खा लिया था.
दुनिया को अपने आगे झुकाने का ख़्वाब देखने वाले हिटलर ख़ुद की लाश ज़मीन पर पड़ी थी और यह एक क्रूर तानाशाह का दर्दनाक अंत था.
हादसे को भांपते हुए हिटलर के अंगरक्षक लिंगे ने कमरे में घुसकर हिटलर के शव को कंबल में लपेट दिया. हिटलर तथा कुछ घण्टे पूर्व शादी के बंधन में बंधी उसकी पत्नी इवा के शवों को इमरजेंसी दरवाज़े से ऊपर चांसलरी के बगीचे में लाया गया और वहाँ उनके शवों में आग लगाई गई. जब लपटें कम हुई तो उन पर और पेट्रोल डाला गया. ढाई घंटे तक लपटें उठती रहीं. रात 11 बजे ग्वेंशे ने एसएस जवानों को उन जले हुए शवों को दफ़नाने के लिए भेजा.”
नैतिक रूप से बौनापन
व्यक्ति के विचार ही उसके कर्मों के जनक होते हैं. अनैतिक कथनी, अनैतिक करनी की जननी होती है. हिटलर का नैतिक बौनापन उसके कथनों में साफ़- साफ़ झलकता है. हिटलर ने अपनी जातीय श्रेष्ठता के आग्रह के चलते दुनिया को विनाश के मुहाने पर खड़ा कर दिया था. . हिटलर की सोच का निर्माण उसकी वंशगत-श्रेष्ठता बोध से हुआ था. वह कहता था कि शुद्ध रक्त वाला व्यक्ति श्रेष्ठ होता है.”दूषित रक्त वाला व्यक्ति शुद्ध रक्त वाले प्राणी से निम्न तो होता ही है. साथ ही वह पतनोन्मुख भी शीघ्रता से होता है.”… “ राज्य को यह तय कर देना चाहिए कि स्वस्थ दम्पति को ही सन्तानोत्पत्ति का अधिकार है, तथा उनमें बीमार अथवा वंशानुगत दोष होने पर प्रजनन न करना अति गौरवपूर्ण होगा….ऐसे लोगों को प्रजनन के अयोग्य घोषित … करना होगा.”
हिटलर और उसके प्रिय प्रचारमंत्री गोएबल्स की जुगल जोड़ी के नाम से प्रचारित कुछ ख़ास नुस्खों से अवगत हो लीजिए ताकि उनके व्यक्तित्व की खूबियां/ खामियां समझी जा सकें.
Make the lie big, make it simple, keep saying it, and eventually they will believe it……
बड़ा झूठ बोलो, उसे सरल ढंग से कहो, बार बार कहते रहो, और अंततोगत्वा लोग उस पर यकीन कर लेंगे.
The great masses of the people will more easily fall victims to a big lie than to a small one.
लोगों का बड़ा आमजन समूह छोटे झूठ की अपेक्षा बड़े झूठ का आसानी से शिकार बन जाता है .
All propaganda has to be popular and has to accommodate itself to the comprehension of the least intelligent of those whom it seeks to reach.
सभी प्रचार/ दुष्प्रचार लोकलुभावन होने चाहिए और इन्हें जिन तक पहुंचाना है उनमे से सबसे कम बुद्धिमान व्यक्ति के भी समझ में आना चाहिये .
By the skillful and sustained use of propaganda, one can make a people see even heaven as hell or an extremely wretched life as paradise!
कुशल और निरंतर प्रचार के ज़रिये, किसी राष्ट्र को स्वर्ग भी नर्क की तरह दिखाया जा सकता है या एक बिलकुल मनहूस जीवन को स्वर्ग की तरह दिखाया जा सकता है .
It is not truth that matters, but victory.
सत्य कोई मायने नहीं रखता है , मायने रखती है जीत .
Great liars are also great magicians.
महान असत्यवादी महान जादूगर भी होते हैं.
Demoralize the enemy from within by surprise, terror, sabotage, assassination. This is the war of the future.
आश्चर्य, भय, तोड़-फोड़, हत्या के ज़रिये दुश्मन को अन्दर से हतोत्साहित कर दो. यह भविष्य का युद्ध है.
Humanitarianism is the expression of stupidity and cowardice.
मानवतावाद मूर्खता और कायरता की अभिव्यक्ति है.
I believe today that my conduct is in accordance with the will of the Almighty Creator.
मेरा मानना है कि आज मेरा आचरण सर्वशक्तिमान निर्माता/ परमात्मा की इच्छा के अनुसार है.
I do not see why man should not be just as cruel as nature.
मुझे यह नहीं समझ आता कि इंसान को प्रकृति के जितना ही क्रूर क्यों नहीं होना चाहिए .
*Mankind has grown strong in eternal struggles and it will only perish through eternal peace.
मानवजाति शाश्वत संघर्ष से शक्तिशाली हुई है और ये सिर्फ अनंत शांति के माध्यम से नष्ट होगी .
Strength lies not in defense but in attack.
ताकत बचाव में नहीं आक्रमण में निहित है .
Struggle is the father of all things.
संघर्ष सभी चीजों का जनक है .
The art of leadership… consists in consolidating the attention of the people against a single adversary and taking care that nothing will split up that attention.
नेतृत्व की कला…एक एकल दुश्मन के खिलाफ लोगों का ध्यान संगठित करने और यह सावधानी बरतने में है कि कुछ भी इस ध्यान को तोड़ न पाए .
The very first essential for success is a perpetually constant and regular employment of violence.
सफलता की सबसे पहली आवश्यकता हिंसा का नियमित और निरंतर प्रयोग है .
Those who want to live, let them fight, and those who do not want to fight in this world of eternal struggle, do not deserve to live.
जो जीना चाहते हैं उन्हें लड़ने दो और जो अनंत संघर्ष वाली इस दुनिया में नहीं लड़ना चाहते हैं उन्हें जीने का अधिकार नहीं है .
If you win, you need not have to explain…If you lose, you should not be there to explain!
अगर आप जीत जाते हैं तो आपको कोई सफ़ाई देने की जरूरत नहीं…अगर हार जाते हैं तो सफ़ाई देने के लिए आपको वहाँ होना ही नहीं चाहिए.
विवेचना
जर्मनी में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उपजी परिस्थितियों में मजबूत नेता की कमी के कारण लोगों ने एक ऐसे व्यक्ति पर भरोसा कर लिया था, जो अपनी कमजोरियों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराता था. लोग भी इस पर विश्वास करते चले गए और फिर जर्मनी और हिटलर का जो हुआ उसका गवाह इतिहास भी बना.
हिटलर की जीवनी लिखने वाली इयान केरशा के अनुसार हिटलर ने तीन चीजें कीं …….एक, वो जर्मनी के लोगों के गुस्से, तकलीफ और अपमान का प्रवक्ता बन बैठा….दो, उसने जर्मनी को बेहतर और सुंदर समाज का सपना दिखाया. जब स्थापित नेता मौजूदा व्यवस्था में ही मगजमारी कर रहे थे, तब हिटलर ने कहा कि इस पूरी व्यवस्था को ही बदलने की जरूरत है क्योंकि दोष व्यवस्था में ही है….तीन, स्थापित नेताओं की जगह उसने खुद को एक ऐसे लीडर के तौर पर पेश किया जो परिस्थितियों से समझौता नहीं करता और सपनों को पूरा करने का माद्दा रखता है.
इस बात में दो राय नहीं कि प्रथम विश्वयुद्ध में हार जाने के बाद जर्मनी अपमानित महसूस कर रहा था. इसी अपमान ने हिटलर को जन्म दिया, इसी अपमान ने यहूदी समाज के प्रति भेदभाव (Extreme Anti-Semitic) संबंधी विचारों को जगह दी. इसी अपमान ने नाज़ी पार्टी व जर्मनी के आम नागरिक को द्वितीय विश्वयुद्ध में झोंक दिया!
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