विश्व का सबसे ज़्यादा ग़ैर-बराबरी वाला देश भारत

दैनिक समाचार

जहाँ एक तरफ़ देश की 84 प्रतिशत मेहनतकश जनता की आमदनी लाॅकडाउन के समय कम हुई, वहीं भारत में अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़कर 142 हो गई है। मार्च 2020 से नवंबर 2021 तक के डेढ़ साल के समय में अरबपतियों की दौलत 23.14 लाख करोड़ से बढ़कर 53.16 लाख करोड़ हो गई, जबकि बेहद कंजूसी करके इकट्ठा किए गए आँकड़ों की भी मानें तो वे भी बताते हैं कि इस समय कम-से-कम पाँच करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनकी रोज़ी-रोटी के साधन बर्बाद होने से वे ग़रीबी रेखा से नीचे आ गए। भारत में इस भयंकर ग़ैर-बराबरी की ताज़ा हालत का खुलासा 16 जनवरी को ऑक्सफ़ेम संस्थान द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में हुआ है।

भारत इस समय बड़े देशों में से सबसे ज़्यादा ग़ैर-बराबरी वाला देश है। इस बात की पुष्टि उस समय भी हो रही है, जब सरकारी स्तर पर ग़ैर-बराबरी की आँकड़ा-रिपोर्टें या तो सरकार की तरफ़ से जारी ही नहीं की जा रही हैं और या बेहद घटाकर पेश की जा रही हैं। तीन साल पहले इसकी काफ़ी चर्चा हुई थी जब यह सामने आया था कि मोदी सरकार ने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के बेरोज़गारी के आँकडों को दबा लिया है। राष्ट्रीय आँकड़ा-विज्ञान कमिशन के दो सदस्यों ने उस समय इस्तीफे़ भी दिए थे। इसके अलावा सरकार रस्मी और ग़ैर-रस्मी रोज़गार की परिभाषाएँ बदलकर ही सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश करती आ रही हैं, ताकि लोगों को यह लगे कि रस्मी क्षेत्र में रोज़गार बढ़ रहा है।

परंतु मोदी सरकार की इन घटिया कोशिशों के बावजूद भी ग़ैर-बराबरी ऐसी चीज़ है, जो छुपाए नहीं छुप रही। पूँजीवादी नीतियों का बोझ अपने शरीर पर ढोने वाले मेहनतकश लोगों को अच्छी तरह से पता है कि सत्ता के नज़दीक रहने वाले तगड़े लोग इस अरसे में और अमीर होते गए हैं, जबकि उनके लिए गुज़ारा चलाना और भी मुश्किल होता जा रहा है। साल 2020 तक यानी लाॅकडाउन से पहले ही हालत ऐसी थी कि कुल आबादी के निचले 50 प्रतिशत हिस्से का भारत की कुल आमदनी में हिस्सा कम होकर सिर्फ़ 13 प्रतिशत रह गया था, जबकि ऊपर का 10 प्रतिशत हिस्सा कुल आमदनी का 57 प्रतिशत तक हड़प रहा था।

अमीरों के लिए लॉकडाउन का साल और भी कि़स्मतवाला था – जहाँ 99 प्रतिशत लोगों की हालत पहले से बुरी हुई है, वहीं संसार के सबसे बड़े अरबपतियों की दौलत दुगुनी हो गई। संसार में सबसे ज़्यादा बढ़ौतरी गौतम अडानी की दौलत में हुई, जिसकी कुल दौलत लॉकडाउन के समय आठ गुणा बढ़ी। हम सभी जानते हैं कि गौतम अडानी ने मोदी सरकार के साथ अपना भाईचारा इस्तेमाल करके यह मुक़ाम हासिल किया है। मोदी सरकार ने अडानी पर मेहरबान होकर जनता की कमाई से खड़े किए गए सरकारी संस्थानों – बंदरगाहें, कोयला खदाने, हवाई-अड्डे आदि सब अडानी के हवाले कर दिए।

ग़ैर-बराबरी के अन्य पैमानों के मुताबिक़ भी भारत का हाल बेहद बुरा है। श्रम की कुल आमदनी में महिलाओं का हिस्सा सिर्फ़ 18% है। यह संसार औसत से लगभग आधा ही है। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि भारत में औरत मज़दूरों से मामूली तनख़्वाहों पर काम लिया जाता है, पुरुष मज़दूरों से तनख़्वाह कम दी जाती है। इसके अलावा रिर्पोट में यह भी सामने आया है कि पर्यावरण की तबाही के लिए भी अमीर तबक़ा ही सबसे ज़्यादा जि़म्मेदार है। अक्सर ही मीडिया और सरकारें आम जनता पर पर्यावरण प्रदूषण का दोष लगा देते हैं। पर इस रिर्पोट के मुताबिक़ भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन की निकासी 2.2 मीट्रिक टन सालाना है। पर सिर्फ़ ऊपर वाले 1% तबक़े की सालाना कार्बन निकासी 32.4 मीट्रिक टन है, यानी औसत से 16 गुणा ज़्यादा! कहने का मतलब यह है कि अमीर तबक़ा ही अपनी कारों-कारख़ानों-जहाज़ों-पर्यटन आदि के ज़रीए गंदा धुँआ छोड़ रहा है, जिसका ख़ामियाज़ा आम लोग भुगत रहे हैं। यानी यह ग़ैर-बराबरी मेहनतकश जनता को तो बरबाद कर ही रही है, बल्कि पर्यावरण की तबाही का कारण भी बन रही है।

ऐसी ग़ैर-बराबरी के बावजूद इस मसले पर सरकारों का रवैया बिल्कुल बेरुख़ी वाला है। शुरू से ही भारत में सरकार अपनी आमदनी के लिए प्रत्यक्ष करों के मुकाबले अप्रत्यक्ष करों पर ज़्यादा निर्भर रही है। लॉकडाउन के डेढ़ साल के दौरान भी यही रुझान जारी रहा, जब मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर कर बढ़ाकर इनकी क़ीमतें सौ रुपए तक पहुँचा दी थीं। इसका सीधा प्रभाव आम लोगों की खपत वाली चीज़ों की महँगाई के रूप में पड़ा। दूसरी तरफ़ पूँजीपतियों पर लगने वाले संपत्ति कर को सरकार ने 2016 में ही ख़त्म कर दिया था और बाक़ी क़सर पिछले साल निकाल दी, जब कारपोरेट टैक्स की दरों को 30% से घटाकर 22% कर दिया। इससे सरकार को आमदनी में हुआ 1.5 लाख करोड़ का घाटा सरकार आम लोगों से ही वसूल रही है। मेहनतकशों पर टैक्सों के बढ़ते बोझ और पूँजीपतियों को टैक्सों में छूट ने भी भारत में ग़ैर-बराबरी बढ़ाने में भूमिका निभाई।

इसके अलावा सरकार का सेहत और शिक्षा पर मामूली-सा ख़र्च भी ग़ैर-बराबरी बढ़ाने के लिए जि़म्मेदार है। भारत सरकार सेहत पर कुल घरेलू उत्पादन का सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत और शिक्षा पर मुश्किल से 3 प्रतिशत ही ख़र्च करती है, जिसके कारण आम लोगों को अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और अपने होने वाले सेहत ख़र्चों के लिए अपनी आमदनी से ख़र्चा करना पड़ता है। सेहत जैसी फ़ौरी ज़रूरत पर हो रहे ख़र्चे के कारण ही हर साल लाखों लोग ग़रीबी के मूँह में धकेले जाते हैं।

आगे का रास्ता क्या है?

ग़ैर-बराबरी की इस बीमारी को ख़त्म करने के लिए हमें दो बातों को समझने की ज़रूरत है। सबसे पहले बुनियादी बात तो यह है कि जब तक मौजूदा पूँजीवादी ढाँचा कायम रहेगा, तब तक ग़ैर-बराबरी बढ़ती ही रहेगी, क्योंकि मुनाफ़े पर टिकी इस व्यवस्था का यह स्थाई नियम है कि यहाँ विकास के साथ दौलत ज़्यादा-से-ज़्यादा केंद्रित होती जाएगी, यानी आम जनता की क़ीमत पर धन्ना सेठों की अमीरी बढ़ती जाएगी।

दूसरी बात यह है कि ऑक्सफ़ेम जैसी संस्थाएँ कोई जनपक्षधर नहीं हैं। ये इसी पूँजीवादी ढाँचे को बचाने का ही काम करती हैं। आज इनके द्वारा ग़ैर-बराबरी का मुद्दा इसलिए उभारा जा रहा है, ताकि अपनी सरकारों को इस उभरते खतरे से चौकन्ना कर सकें। ग़ैर-बराबरी का “हल” पेश करते समय ये एन.जी.ओ. मार्का संस्थाएँ सरकारों को अमीरों पर टैक्स लगाने की वकालत करती हैं। ऐसा करके वे ग़ैर-बराबरी के असल कारणों पर परदा भी डालना चाहती हैं और साथ ही जनता के ग़ुस्से पर ठंडे पानी के छींटे भी मारना चाहती हैं। जबकि मुख्य सवाल इस मुनाफ़ाखोर व्यवस्था को बदलना है, ना कि इसी व्यवस्था के तहत “सुधार” करने का। अगर अमीरों पर टैक्स लगा भी दिए जाएँ, तब भी ग़ैर-बराबरी का बढ़ना जारी रहेगा। मिसाल के तौर पर दूसरे विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी पूँजीवादी देशों में पूँजीपतियों की आमदनी पर बड़े टैक्स लगते थे, पर इसके बावजूद इन देशों में आज भी भयंकर ग़ैर-बराबरी मौजूद है, इसलिए अमीरों पर टैक्स लगाने और लोगों पर टैक्सों का बोझ घटाने की जनवादी माँग करने के साथ-साथ हमें यह भी समझना पड़ेगा कि ग़ैर-बराबरी का पूर्ण ख़ात्मा इस पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को बदलकर ही किया जा सकता है।

– मानव

मुक्ति संग्राम – बुलेटिन 16 ♦ मार्च 2022 में प्रकाशित

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