धर्म और ईश्वर

दैनिक समाचार

“मैं धर्म को नहीं ईश्वर को मानता हूँ”,

यह आधुनिक अध्यात्मवाद है,

यह कुछ कुछ उसी तरह है जैसे लोग कहते हैं “मैं अन्धविश्वासी नहीं धार्मिक हूँ”…..

सत्य यह है कि बात धर्म की हो या ईश्वर की आपके पास अन्धविश्वास के अलावा और कोई चारा ही नहीं है…..

अच्छा ये बताओ ईश्वर का परिचय आपको किसने दिया?

कुछ पाने के लालच एवं कुछ खोने के भय से धर्म के द्वारा सदियों से विकलांग किये गए दिमाग को कुछ तो चाहिए लटकने के लिए…..

उसी से आजकल के आधुनिक अध्यात्मवाद की रचना हुई कि धर्म को न और ईश्वर को हाँ……

परन्तु धर्म ने ही ईश्वर की असत्य कल्पना से भयादोहन और शोषण की नींव रखी…..

परन्तु मैं खुश हूँ और सकारात्मक रूप से आशान्वित हूँ……

कम से कम इन्होने अन्धविश्वास और धर्म को गलत मानना शुरू तो किया…..

ये पहला कदम है सत्य की तरफ …..

कुछ समय में जब काल्पनिक ईश्वर से भी आस टूटेगी,

तब टूटेगा इनका नशा भी…..

असल में यही क्रम है,

एक प्रोसेस है,

पहले अन्धविश्वास जाते हैं,

फिर धर्म जाता है,

और फिर ईश्वर भी ……

मुझे नयी पीढ़ी से बहुत आशाएं हैं।

Balendu

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