यह तो जाहिर है कि हिन्दुओं को इस्लाम के पक्ष में लाने के लिए मंदिरों को नहीं तोड़ा जाता रहा होगा, क्योंकि कोई भी यह कल्पना भी नहीं कर सकता है कि किसी जनमानस के हृदय को जीतने का तरीका है जाकर उसके मंदिरों को तोड़ डालें.
मंदिरों को तोड़ने से हिन्दू प्रजा के हृदय में इस्लाम के प्रति अगर नफरत नहीं पैदा होगी तो कम से कम प्यार तो निश्चित तौर पर नहीं ही उपजेगा. इसलिए इसके पीछे उनके धर्म-परिवर्तन का नहीं, कोई और ही उद्देश्य होता था जिसे साम्प्रदायिक इतिहासकार बड़ी चालाकी से छिपा ले जाते हैं.
ध्यान देने की बात है कि आमतौर पर दुश्मन के इलाके में ही मंदिर तोड़े जाते रहे; वे खुद सुल्तान के साम्राज्य में नहीं नष्ट किये जाते थे, बशर्ते वे मंदिर राज्य के खिलाफ षड्यंत्र या बगावत के केन्द्र न बन गये हों, जैसा कि औरंगजेब के शासनकाल में होता रहा. इस तरह स्पष्ट है कि दुश्मन के इलाके में मंदिरों को नष्ट कर डालना सुल्तान की विजय का प्रतीक होता था.
उल्लेखनीय है कि हिन्दू राजतंत्रों के लिए राजनीतिक चुनौती बनकर मुसलमानों के आविर्भूत होने के बहुत पहले हिन्दू शासक भी दुश्मन के इलाके के मंदिरों का यही हाल किया करते थे.
परमार शासक सुभटवर्मन (1193-1210 ई.) ने गुजरात पर हमला करके डभोई और खंभात के बहुत से जैन मंदिरों को लूट लिया था.
कश्मीर के शासक हर्ष ने अपना राजकोष भरने के लिए स्वयं अपने राज्य के चार मंदिरों को छोड़ कर सारे मंदिरों को लूटा था.
विडंबना ही है कि इतिहासकार उसके विरोध में एक शब्द नहीं कहते हैं और सुलतानों द्वारा मंदिरों को लूटने की घटनाओं का बढ़ा चढ़ा कर वर्णन करके इतिहास को सांप्रदायिक रंग देने से नहीं चूकते.