आपको लगता है कि आप अपने मन से, अपनी मर्जी से वोट देकर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और सांसद, विधायक चुनते हैं। तो निश्चित ही गलतफहमी के शिकार हैं। जरा सोचिये किसी विधानसभा/लोकसभा के लिये कई प्रत्याशी मैदान में होते हैं पर लड़ाई सिर्फ दो या तीन के बीच होती है। ये बात आम जनता के बीच आती कंहा से है कि फलां विधानसभा/लोकसभा सीट पर फलां-फलां के बीच लड़ाई है। यह बात इलेक्ट्रानिक/प्रिंट/सोशल मीडिया और उन्हीं पार्टियों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता उन पार्टियों के खरीदे गये दलाल जाति/धर्म/दबंग/बाहुबली/सामन्त/माफिया/दानी/धर्माधीस…. का चेहरा दिखा हमारे-आपके दिमाग में डाल देते हैं और आम जनता इनके गणित को सच मान जब एक दूसरे से चर्चा करते हैं तो फलां-फलां प्रत्याशी पर ही चर्चा होती है। तो आम जनता विधानसभा/लोकसभा चुनाव में सभी प्रत्याशियों में से जिनपर माहौल बन जाता है उन 2-3 प्रत्याशियों को छोड़कर बाकी प्रत्याशियों को दरकिनार कर उनमें से सबसे पहले जाति ढूँढ़ती है, जाति नहीं मिला तो धर्म देखती है फिर गाँव/जिला/प्रदेश फिर पैसों और ताकत में देखती है तब जाकर जो 2-3 प्रत्याशी जिनमें लड़ाई है जाकर उन्हीं में एक को वोट देते हैं। तो साथियों यंहा ध्यान से देखिये कि लड़ने को तो कई प्रत्याशी लड़ रहें हैं पर उनको कोई पूछने वाला नहीं वो सिर्फ नाम के प्रत्याशी रह गये हैं क्योंकि वो प्रत्याशी वोटिंग से पहले ही लड़ाई से बाहर हो गये और मीडिया/पार्टी कार्यकर्ताओ/दलालों के जरिये पहले से ही निर्धारित प्रत्याशी जनता के ऊपर थोप दिये जाते हैं और कहते हैं जनता ने अपना मत अपने हिसाब से देकर अपना प्रतिनिधि चुना है और जनता मान भी लेती है।
अब यंहा किसी से भी पूंछा जाये कि क्या आप चाहेंगे कि चोर/डाकू/कत्ली/अधर्मी/बलात्कारी/गंभीर धाराओं के अपराधी…. को संसद/विधायक चुनकर लोकसभा/विधानसभा में जाना चाहिये। शायद ही कोई होगा जो चाहेगा कि चोर/डाकू/कत्ली/अधर्मी/बलात्कारी/गंभीर धाराओं के अपराधी…. को वोट देकर संसद/विधायक बनाकर लोकसभा/विधानसभा में जायें इक्का दुक्का लोगों को छोड़कर। तो अब मजे की बात ये है कि जब कोई नहीं चाहता कि चोर/डाकू/कत्ली/अधर्मी/बलात्कारी/गंभीर धाराओं के अपराधी…. चुनकर लोकसभा/विधानसभा में जायें तो ये संसद/विधायक का चुनाव जीतकर लोकसभा/विधानसभा में पहुंचते कैसे हैं?
चोर/डाकू/कत्ली/अधर्मी/बलात्कारी/गंभीर धाराओं के अपराधी…. को अपना प्रतिनिधि चुनकर हम-आप ही लोकसभा/विधानसभा में भेजते हैं। मीडिया/पार्टी कार्यकर्ताओ/दलालों के जरिये थोपे गये लोगों में से हम लोग ही जाति/धर्म/दबंग/बाहुबली/सामन्त/माफिया/दानी/धर्माधीस…. देखकर चुनते हैं। वोट देने से पहले सोचते हैं कि चलो बुरा ही सही हमारे जाति/धर्म का है, हमारे गांव-ज्वार का है, वो हमारा अपना है, इसी को ही वोट देते हैं। गाली देकर वोट देते हैं चाहे वह कितना बड़ा अपराधी ही क्यूँ ना हो (बस अपने जाति/धर्म/गांव/ज्वार…. का हो), क्योंकि हम-आप सोचते हैं कि मैने अपना मतदान दूसरे अन्य प्रत्याशी जो लड़ाई में नहीं हैं उनको किया तो बेकार चला जायेगा क्योंकि वो कमजोर है, वो लड़ाई में नहीं है और हम मीडिया/पार्टी कार्यकर्ताओ/दलालों द्वारा दिखाये गये प्रत्याशियों में ही चुनने को मजबूर हो जाते हैं और अन्ततः उन्हीं 2-3 प्रत्याशियों में से चुनकर उन्हीं में से एक को वोट देते हैं। इससे साफ हो जाता है कि हम अपने मनसे तो वोट देकर अपना प्रतिनिधि तो नहियै चुनते हैं। यदि अपने मन से वोट देते तो निश्चित ही कोई भी चोर/डाकू/कत्ली/अधर्मी/बलात्कारी/गंभीर धाराओं के अपराधी…. चुनकर नहीं आता।
जिस प्रत्याशी को जनता चुनाव में उसको मतदान ना कर उसको चुनाव के जरिये हरा देती है इसका साफ मतलब है कि जनता नहीं चाहती कि वो प्रत्याशी विधानसभा/लोकसभा में जाए तो फिर उसको विधान परिषद/राज्यसभा के जरिये नामित कर जनादेश के खिलाफ क्यूँ लोकसभा/विधानसभा के सदन में भेजा जाता है? जबकि जनता तो नकार ही चुकी है ऐसे विधायक/सांसद प्रत्याशी को। ऐसा जनता के लोकतंत्र में तो नहीं होना चाहिये। तो साथियों हाथी के दाँत खाने के और होते हैं, दिखाने को और। इसी प्रकार मेहनतकश जनता को भरमाया जाता है कि ये असली लोकतंत्र है! ये जनता का ही लोकतंत्र है! अब राजा रानी के पेट से नहीं जनता के वोट से चुना जाता है। सुनने में कितना अच्छा लगता है कि जनता ही अपना प्रतिनिधि चुनती है। पर ऐसा होता नहीं है, निश्चित ही वोट तो जनता ही देती है पर चुनने की आजादी नहीं होती, जो पहले से ही मीडिया/पार्टी कार्यकर्ताओ/दलालों के द्वारा निर्धारित किये गये प्रत्याशी को ही वोट देने को जनता मजबूर होती है।
इस पूंजीवादी लोकतंत्र में कहकर जनता को भरमाया जाता है कि यंहा जनता ही मालिक है और मेहनतकश जनता इनके भ्रम में आ जाती है और इस भ्रम को बनाए रखने और इस फेंक लोकतंत्र में जनता का विश्वास बनाये रखने के लिये वोटिंग मशीन यानी ई वी एम में नोटा का बटन भी लगा दिया गया और बताया गया कि चुनाव मैदान में खड़े प्रत्याशी पसन्द ना हो तो नोटा (इनमें से कोई नहीं) का बटन दबाओ। जबकि इस नोटा का बटन दबाने से कोई मतलब नहीं। यदि मतलब होता तो मान लीजिये किसी सीट पर प्रत्याशियों से ज्यादा वोट नोटा को मिलता, इसका मतलब जनता ने सबको नकार दिया इन खड़े प्रत्याशियों काबिल नहीं और फिर इस सीट से कभी भी इनको चुनाव लड़ने पर पाबन्दी लगाया जाता और नये प्रत्याशियों के साथ पुनः चुनाव होता। पर ऐसा कुछ होता नहीं, नोटा के बाद दूसरे नम्बर के प्रत्याशी को ही जीत का सर्टिफिकेट दे देकर जनता को खुलेआम चूतिया बनाया जाता है। अब आप सोचेंगे कि इसमें सरकार का क्या फायदा तो साथियों नोटा बटन इसलिये लगाया जाता है ताकि इस पूंजीवादी लोकतंत्र प्रणाली में जनता का भरोसा कायम रहे और वोट देने को ही अपना सबसे बड़ा अधिकार समझे।
ये कैसा जनता का लोकतंत्र है जंहा एक आम आदमी विधानसभा/लोकसभा लड़ना चाहे तो लड़ सकता है। पर क्या वो गरीब व्यक्ति चुनाव मैदान में अपने मुकाबले दूसरे अन्य प्रत्याशी जो दबंग/पैसेवाले/सामन्त/माफिया…. से चुनाव में जीत पायेगा? जीतना तो दूर की बात उसके सामने टिक भी नहीं पायेगा और जमानत जब्त हो जायेगी। तो फिर ये जनता का लोकतंत्र कैसे है? इस लोकतंत्र में जिसके पास ढेर सारी पूँजी हो, जो दबंग/पैसेवाले/सामन्त/माफिया/अपराधी…. हो वही जीतने का हकदार है बाकी तो सिर्फ नाम के लड़ रहें हैं। अब यंहा कुछ लोग कुछ गरीब विधायक/सांसद का उदहारण देते हैं कि देखो फलाना व्यक्ति बहुत ही गरीब था, पंचर बनता था, साईकिल से चलता था, खाने को घर में दाने नहीं थे…. ऐसे कई उदाहरण देता है। तो आप भी देखें कि ऐसे गरीब प्रत्याशी किसी ना किसी बड़ी पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव में उतरे हैं और ये बड़ी पार्टियां चुनाव में सभी प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने के लिये नगद पैसा देती हैं और पार्टियां अपने पैसे से उनका प्रचार भी करती हैं। तो अब यंहा सवाल उठता है कि पार्टियों को इस तरह किसी गरीब को लड़ाने से क्या लाभ? उलटा उसको ही सब कुछ करना पड़ता है! तो कई लाभ अप्रत्यक्ष होते हैं जो दिखाई नहीं देते और उनका लाभ धीरे-धीरे दूसरे रूप में मिलता है।
पहली बात राह चलते किसी भी ऐरे-गैरे को पार्टी टिकट नहीं देती। आर्थिक रूप से गरीब हो चलेगा पर सामाजिक रूप से उसकी प्रतिष्ठा होती है तब जाकर ये पार्टियां उनको टिकट देती हैं और उसमें भी जाति/धर्म के हिसाब से देखती हैं कि किस जाति/धर्म के लोग इस सीट पर ज्यादा हैं तब जाकर ऐसे गरीब को चुनते हैं। इस पूंजीवादी लोकतंत्र में सबका भरोसा बना रहे इसीलिये दिखावे के तौर पर एक-आध सीट दे देती हैं लगभग सभी पार्टियां और उस गरीब प्रत्याशी जिसके गरीबी का महिमामंडन मीडिया के जरिये किया जाता है उसको ही जिता दिया जाता है और उस गरीब के जीत का भी खूब ढिंढोरा पीटा जाता है और इसको मिशाल के तौर पर पेश किया जाता है इस फेंक लोकतंत्र का। ताकी जनता को लगे कि देखो वो गरीब था और जीत गया तो हम तो उससे अच्छी स्थिति में हैं। हम भी चुनाव जीत सकते हैं? एक आस सी बंध जाती है इस पूंजीवादी लोकतंत्र में। और इस आस में कोई गरीब लड़ जाये तो जीत तो दूर की बात जमानत तक जब्त हो जाती है क्योंकि उसको ये नहीं मालूम कि उस गरीब को लड़ाने और जिताने में एक षड़यंत्र है लोगों का इस फेंक लोकतंत्र में विश्वास बनाये रखने के लिये। आप स्वयं देखें कि कितने गरीब प्रत्याशी जीतते हैं? लड़ते तो कई हैं पर जीतता तो एक-आध ही है।
इस चुनाव में गरीब को चुनाव लड़ने की आजादी तो है पर यह चुनाव लड़ने की आजादी भी फेंक है उसी तरह जैसे चिड़िया के पंख कुतर दो और बोलो ये सारा आसमान तुम्हारा है जाओ जंहा इच्छा हो उड़ जाओ। आपके हाथ पैर में गुलामी की जंजीरें बंधी हो और उसको खोल दिया जाये पर आपके चारों तरफ गहरी खाई खोद दी जाये और आपसे कहा जाये ये सारी धरती तुम्हारी है जाओ जंहा मर्जी हो जाओ ऐसे ही इस पूंजीवादी लोकतंत्र में भी ऐसा ही भद्दा मजाक मेहनतकश जनता के साथ किया जा रहा है।
हमें लगता है कि मुख्यमंत्री /प्रधानमंत्री हम यानी जनता ही चुनती है। तो साथियों ये भी हमारा भ्रम है। हम सीधे तौर पर मुख्यमंत्री /प्रधानमंत्री को तो वोट देते नहीं क्योंकि हम मुख्यमंत्री /प्रधानमंत्री नहीं जबकि हम विधायक /सांसद चुनते हैं और वही विधायक /सांसद मिलकर पूंजीपतियों द्वारा भेजा गया व्यक्ति ही मुख्यमंत्री /प्रधानमंत्री बनता है। हम यंहा एक और भ्रम पाले बैठे हैं कि पार्टी मुख्यमंत्री /प्रधानमंत्री चुनती है। यदि एकबारगी आपके इस भ्रम को सही भी मान लें तो कई बार देखा गया है कि जिस मुख्यमंत्री /प्रधानमंत्री के चेहरे पर उस पार्टी के प्रत्याशी चुनते हैं उस चेहरे को बीच में हटाकर दूसरे को मुख्यमंत्री /प्रधानमंत्री बना दिया जाता है और ऐसा कई बार हुवा भी है। कई बार तो मुख्यमंत्री /प्रधानमंत्री का चेहरा ही तय नहीं होता और फिर बहुमत वाली पार्टी अपने हिसाब से मुख्यमंत्री /प्रधानमंत्री तय करती है।
लिखना आगे जारी रहेगा….
अजय असुर
राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा